योग से दूर हो सकते है शारीरिक और मानसिक विकार-डॉ सीमा
कसया, कुशीनगर ।उपभोगितावादी मानसिकता के कारण लोगों के मन में तमाम तरह की इच्छाएं अपना प्रभाव डाल रही है इन्ही प्रभावों को पूरा करने के लिये व्यक्ति व्यस्तता और मानसिक तनाव में जकड़ा जा रहा है। मन की ओर कदम बढ़ाना और अपने चित्त की इन्ही वृत्तियों को चंचल होने से रोकना ही योग है। योग के माध्यम से हम शारीरिक व मानसिक विकारों को दूर कर सकते है।उक्त बातें नयी दिशा पर्यावरण सेवा संस्थान द्वारा विश्व योग दिवस के अवसर पर आयोजित फेसबुक लाइव वार्ता में "योग और मानसिक स्वास्थ्य" विषय पर बोलते हुए बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय में मनोविज्ञान की सह आचार्य डॉ सीमा त्रिपाठी ने कहीं।
योग पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय दर्शन में योग के महत्व को विस्तार से बताया गया है। सांख्य दर्शन पुरुष और प्रकृति का पार्थक्य स्थापित करते हुए पुरुष के स्व में अवस्थित होने को ही योग बताता है, वहीं विष्णु पुराण में योग को आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग बताया गया है। श्रीमद्भागवत तीन प्रकार के योग की बात करता है ज्ञान, कर्म और भक्ति योग। पर इन सबमे सबसे ज़्यादा महत्व पतंजलि के अष्टांग योग को दिया गया है क्योंकि पतंजलि का योग चित्त की वृत्तियों का निरोध कर मोक्ष की प्राप्ति की बात करता है। इसके लिए इस योग सूत्र में 8 मार्ग बताए गए है - यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। पहले चार मार्ग शरीर और मन पर नियंत्रण स्थापित करने और बाद के चार मार्ग आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के उपाय हैं। योग व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, और आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ रखता है और आत्मबोध करने में सहायक होता है।
योग के शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा करते हुए डॉ त्रिपाठी ने बताया कि योग शारीरिक क्रियाओं और तंत्रों की क्रियात्मकता को सुचारू कर हमें स्वस्थ रखता है। ये हमारे लसिका तंत्र, चयापचय तंत्र, असंक्राम्य प्रणाली, परिसंचालन तंत्र आदि को ठीक कर हमें न सिर्फ रोगों से बचाता है अपितु ऊर्जावान भी रखता है। योग से नाड़ी तंत्र भी बेहतर होता है और इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों के कार्य में संतुलन स्थापित होता है।
योग और मानसिक स्वास्थ्य के संबंधों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ केवल मानसिक विकार का आभाव नही है बल्कि संज्ञानात्मक, व्यवहारगत और संवेदनात्मक सलामती है जिसमे हमारी सोच, हमारी भावना और हमारे व्यवहार सब आते हैं। वर्तमान आपाधापी का समय हर व्यक्ति में चिंता और तनाव उत्पन्न कर रहा है। योग मन और इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित कर मन को शांत करता है तथा ऊर्जा का वहां करने वाले मुख्य स्रोतों का शुद्धिकरण करता है। इस प्रकार ये जीवन शक्ति को बढ़ाकर तनाव से बचाता है। साथ ही योग हमारे तांत्रिक तंत्र की कार्य प्रणाली को सुधार कर ऊर्जा का अपव्यय भी रोकता है। योग से शरीर मे ओसिटोसिन नामक हार्मोन के स्राव में भी वृद्धि होती है,जिससे मन मे नाकारात्माके विचार नही आते और हम धनात्मक विचारों से भरे रहते हैं।
इसके अतिरिक्त योग अन्य कई मानसिक बीमारियों की चिकित्सा में भी लाभकारी पाया गया है। जैसे अवसाद, पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर, मनोविदलता, अनिद्रा आदि के रोगियों में 40 से लेकर 80 प्रतिशत तक सुधार देखा गया है। अंत में डॉ त्रिपाठी ने कही की हम अभी को अपने दैनिक दिनचर्या में योग और प्राणायाम जरूर करना चाहिये जिससे हम सभी शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ्य रह सकते है। और स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन रहता है इसकी परिकल्पना को भी साकार कर सकते है। उपभोगितावादी मानसिकता के कारण लोगों के मन में तमाम तरह की इच्छाएं अपना प्रभाव डाल रही है इन्ही प्रभावों को पूरा करने के लिये व्यक्ति व्यस्तता और मानसिक तनाव में जकड़ा जा रहा है। मन की ओर कदम बढ़ाना और अपने चित्त की इन्ही वृत्तियों को चंचल होने से रोकना ही योग है। योग के माध्यम से हम शारीरिक व मानसिक विकारों को दूर कर सकते है।उक्त बातें नयी दिशा पर्यावरण सेवा संस्थान द्वारा विश्व योग दिवस के अवसर पर आयोजित फेसबुक लाइव वार्ता में "योग और मानसिक स्वास्थ्य" विषय पर बोलते हुए बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय में मनोविज्ञान की सह आचार्य डॉ सीमा त्रिपाठी ने कहीं।
योग पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय दर्शन में योग के महत्व को विस्तार से बताया गया है। सांख्य दर्शन पुरुष और प्रकृति का पार्थक्य स्थापित करते हुए पुरुष के स्व में अवस्थित होने को ही योग बताता है, वहीं विष्णु पुराण में योग को आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग बताया गया है। श्रीमद्भागवत तीन प्रकार के योग की बात करता है ज्ञान, कर्म और भक्ति योग। पर इन सबमे सबसे ज़्यादा महत्व पतंजलि के अष्टांग योग को दिया गया है क्योंकि पतंजलि का योग चित्त की वृत्तियों का निरोध कर मोक्ष की प्राप्ति की बात करता है। इसके लिए इस योग सूत्र में 8 मार्ग बताए गए है - यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। पहले चार मार्ग शरीर और मन पर नियंत्रण स्थापित करने और बाद के चार मार्ग आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के उपाय हैं। योग व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, और आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ रखता है और आत्मबोध करने में सहायक होता है।
योग के शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा करते हुए डॉ त्रिपाठी ने बताया कि योग शारीरिक क्रियाओं और तंत्रों की क्रियात्मकता को सुचारू कर हमें स्वस्थ रखता है। ये हमारे लसिका तंत्र, चयापचय तंत्र, असंक्राम्य प्रणाली, परिसंचालन तंत्र आदि को ठीक कर हमें न सिर्फ रोगों से बचाता है अपितु ऊर्जावान भी रखता है। योग से नाड़ी तंत्र भी बेहतर होता है और इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों के कार्य में संतुलन स्थापित होता है।
योग और मानसिक स्वास्थ्य के संबंधों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ केवल मानसिक विकार का आभाव नही है बल्कि संज्ञानात्मक, व्यवहारगत और संवेदनात्मक सलामती है जिसमे हमारी सोच, हमारी भावना और हमारे व्यवहार सब आते हैं। वर्तमान आपाधापी का समय हर व्यक्ति में चिंता और तनाव उत्पन्न कर रहा है। योग मन और इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित कर मन को शांत करता है तथा ऊर्जा का वहां करने वाले मुख्य स्रोतों का शुद्धिकरण करता है। इस प्रकार ये जीवन शक्ति को बढ़ाकर तनाव से बचाता है। साथ ही योग हमारे तांत्रिक तंत्र की कार्य प्रणाली को सुधार कर ऊर्जा का अपव्यय भी रोकता है। योग से शरीर मे ओसिटोसिन नामक हार्मोन के स्राव में भी वृद्धि होती है,जिससे मन मे नाकारात्माके विचार नही आते और हम धनात्मक विचारों से भरे रहते हैं।
इसके अतिरिक्त योग अन्य कई मानसिक बीमारियों की चिकित्सा में भी लाभकारी पाया गया है। जैसे अवसाद, पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर, मनोविदलता, अनिद्रा आदि के रोगियों में 40 से लेकर 80 प्रतिशत तक सुधार देखा गया है। अंत में डॉ त्रिपाठी ने कही की हम अभी को अपने दैनिक दिनचर्या में योग और प्राणायाम जरूर करना चाहिये जिससे हम सभी शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ्य रह सकते है। और स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन रहता है इसकी परिकल्पना को भी साकार कर सकते है।
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