अब निगम क्षेत्र की मिलों में भी बनेगी सल्‍फर लेस चीनी

पवन गुप्ता 

उत्‍तर प्रदेश में अब निगम क्षेत्र की मिलों में भी चीनी बनेगी। गोरखपुर की मुंडेरवा और पिपराइच चीनी मिल से इसकी शुरुआत होगी। 

ये दोनों मिलें, उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम लिमिटेड की हैं। सल्फर लेस चीनी का निर्माण कर दोनों ही मिलें, निगम क्षेत्र की प्रदेश की पहली सल्फर लेस चीनी निर्माण करने वाली इकाई बन जाएंगी। सल्फर रहित चीनी बाजार में उपलब्ध सामान्य चीनी के मुकाबले 01 से 1.50 रुपये प्रति किलोग्राम महंगी होगी। अगर दूसरे देशों से आर्डर मिलेंगे तो इस सल्फर रहित चीनी का निर्यात भी होगा। 

मुण्डेरवा चीनी मिल में डोगा पूजन यूं तो 28 नवंबर को ही हो गया था, इसके साथ ही गन्ने की तौल भी शुरू हो गई थी। लेकिन टरबाइन में तकनीकी खामी के कारण मंगलवार की शाम गन्ना की क्रसिंग शुरू हो सकी। उधर पिपराइच में 30 नवंबर को डोगा पूजन सम्पन्न हुआ। एक-दो दिन में गन्ना की पेराई भी शुरू हो जाएगी। मुण्डेरवा और पिपराइच दोनों ही चीनी मिलों का पेराई का लक्ष्य 65 लाख क्विंटल है, दोनों ही मिलों की 50-50 हजार क्विंटल गन्ना पेराई प्रतिदिन की क्षमता है। हालांकि भारी बारिश के कारण गन्ने का उत्पादन प्रभावित हुआ, ऐसे में लक्ष्य के अनुरूप गन्ना मिलने की संभावना कम ही है। 

25-25 करोड़ रुपये की लगाई गई टरबाइन

सल्फर लेस चीनी बनाने के लिए दोनों ही मिलों में अत्याधुनिक टरबाइन लगाई गई है। दोनों ही चीनी मिलों का निर्माण मेसर्स इस्जेक हेवी इंजीनियरिंग लिमिटेड नोयडा कर रही है। इन नई टरबाइन के निर्माण पर तकरीबन 25-25 करोड़ रुपये की धनराशि खर्च की गई है। इन नई टरबाइन में चीनी की सफाई के लिए कार्बन-डाई-ऑक्साइड का इस्तेमाल होगा। यह कार्बन डाई-आक्साइड चीनी मिलों को डिस्टिलरियों से मुफ्त मिल जाएगी।

स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है सल्फ़र

अभी हमारे यहां चीनी बनाने की मौजूदा तकनीक में गन्ने के रस को साफ करने के लिए चूने के साथ ही सल्फर डाई ऑक्साइड का इस्तेमाल होता है। चीनी बनने के बाद भी सल्फर का कुछ अंश इसमें रह जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस कारण विदेशों में सल्फरयुक्त चीनी पूर्ण रूप से प्रतिबंधित है। वहां दो बार शोधित कर रिफाइंड चीनी उपयोग में लाई जाती है, जिसकी प्रक्रिया जटिल और महंगी भी है। 

विदेशी मुद्रा की बचत होगी

70 पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) सल्फर डाई ऑक्साइड को भारतीय मानक ब्यूरो ने मजबूरी में मान्यता दे रखी है। चीनी बनाने में अभी 20-30 फीसद खर्च तो सल्फर डाई ऑक्साइड पर ही आता है।  विदेशों से सल्फर आयात करने के कारण विदेशी मुद्रा चुकानी पड़ती है। लेकिन नई तकनीक में चीनी की सफाई के लिए कार्बन-डाई-ऑक्साइड इस्तेमाल होगी। कार्बन डाई-आक्साइड चीनी मिलों को डिस्टिलरियों से मुफ्त मिलेगी तो उत्पादन लागत सीधे-सीधे 20 से 30 फीसद तक घट जाएगी। 

नई तकनीकी से सस्ती चीनी और पर्यावरण संरक्षण भी

वन एवं पर्यावरण के क्षेत्र काम करने वाली संस्था हेरिटेज फाउंडेशन के ट्रस्टी नरेंद्र कुमार मिश्र कहते हैं कि नई तकनीकी से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड का भी सदुपयोग होगा। देश चीनी निर्यात करने में सक्षम होगा, तब सल्फर की वजह से इस पर प्रतिबंध नहीं लगेगा। नई तकनीक के अधिक इस्तेमाल के बाद आम जन को चीनी सस्ती भी मिलेगी।

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