घने कोहरे के बीच पौष पूर्णिमा स्नान पर पांच लाख श्रद्धालुओं ने लगाई संगम में डुबकी

 प्रयागराज,28 जनवरी (वार्ता) मोक्ष की कामना के साथ पतित पवनी गंगा, श्यामल यमुना और अन्त: सलिला स्वरूप में प्रवाहित सरस्वती के त्रिवेणी में माघ मेला के दूसरे “पौष पूर्णिमा ” स्नान पर कोरोना और घना कोहरे के बीच 12 बजे तक करीब पांच लाख श्रद्धालुओं ने संगम में लगाई आस्था की डुबकी।

संगम में हालांकि भोर चार बजे से ही “पौष पूर्णिमा ” स्नान शुरू हो गया था। लेकिन घना कोहरे के कारण स्नान घाट लगभग खाली पड़े थे। तड़के चार बजे गिनती के ही श्रद्धालु गंगा तट पर नजर आ रहे थे। आठ बजे तक मुश्किल सेडेढ़ से दो लाख लोगों ने डुबकी लगाई। धीरे धीरे भगवान भास्कर के उदयीमान होने से श्रद्धलुओं की भीड़ बढ़ने लगी और 12 बजे तक चार से पांच लाख श्रद्धालुओं ने स्नान किया।
पुलिस महानिरीक्षक के पी सिंह ने बताया कि दोपहर 12 बजे तक पांच लाख लोगों ने संगम में डुबकी लगाई। उन्होने बताया कि मेला क्षेत्र में श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए चप्पे -चप्पे पर पुलिस, आरएएफ, कमांडो और पीएसी के जवान तैनात है।

उन्होने बताया कि मेला क्षेत्र में अवंछनीय तत्वों पर पुलिस की निगरानी बनी हुई है। फिलहाल मेला क्षेत्र में श्रद्धालु कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए दिखलाई पड़ रहे है। पुलिस लगातार मेला क्षेत्र में चक्रमण कर रही है।
फूलपुर गोमती इटरकालेज के सेवानिवृत्त शिक्षक झूंसी निवासी योगेन्द्र कुमार तिवारी ने बताया कि पाैष पूर्णिमा से कल्पवास का विधिवत शुभारम्भ हो गया। मेला क्षेत्र गृहस्थ तपस्वियों से गुलजार हो गया। इस बार पौष पूर्णिमा गुरूवार को है। गुरूपुष्य नक्षत्र एवं सर्वाथा अमृत सिद्धि योग भी है। जो सफलता एवं संपन्नता देने वाला माना जाता है। मकर राशि में सूर्य, गुरू, शुक्र और शनि संचरण किया। धर्म सिंधु और निर्णय सिंधु के अनुसार एक राशि में चार ग्रहों के संचरण शुभ एवं शौभग्यदायक है। इस पुण्यबेला संकल्प के साथ अनुष्ठान आरंभ करने वालों की समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं। कल्पवास शुरू करने वाले साधकों की मानोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
उन्होने बताया कि कल्पवासियों का घर परिवार से कोई वासता नहीं रह जाता। सुख दु:ख की स्थिति होने पर भी कल्पवासी माघ मेला क्षेत्र छोड़कर नहीं जाते। मेला क्षेत्र छोड़ने पर कल्पवास खंड़ित हो जाता है।
उन्होने बताया कि वैश्विक महामारी से इस बार स्नानार्थी और कल्पवासियों में कमी देखी गयी है। झूंसी क्षेत्र में अभी भी बहुत से स्थान खाली पड़े हैं वहां किसी प्रकार का कोई शिविर तक नहीं लगा है। इसी बात से अंदाजा लगा है कि कोरोना का ड़र तो लोगों में हैं जिसके कारण काफी कम कल्पवासी कल्पवास करने पहुंचे हैं।
श्री तिवारी ने बताया कि वैदिक ज्योतिष और हिन्दू धर्म से जुड़ी मान्यता के अनुसार पौष सूर्य देव का माह कहलाता है। इस मास में सूर्य देव की आराधना से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए पौष पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्नान और सूर्य देव को अर्घ्य देने की परंपरा है। चूंकि पौष का महीना सूर्य देव का माह है और पूर्णिमा चंद्रमा की तिथि है। इसीलिए माना जाता है कि इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों की पूजा करके मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण के अनुसार पौष माह में सूर्य का एवं पूर्णिमा पर चंद्रमा का आधिपत्य है। सूर्य.चंद्र का यह अद्भुत संयोग मात्र पौष पूर्णिमा को ही होता है। इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों के पूजन से मनोकामनाएं पूर्ण होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती है। पौष माह की पूर्णिमा के बाद माघ महीने की शुरूआत हो जाती है।
हिंदू धर्म में पूर्णिमा का दिन खास माना जाता है। मगर पौष माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का अधिक महत्व है। मोक्ष की कामना रखने वालों के लिए यह दिन बेहद खास होता है। इस तिथि को सूर्य और चंद्रमा के संगम भी कहा जाता है, क्योंकि पौष का महीना सूर्य देव का माह होता है और पूर्णिमा चंद्रमा की तिथि है। चंद्रमा के साथ.साथ पूर्णिमा का दिन भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है। इस दिन गंगासागर, त्रिवेणी, हरिद्वार, काशी आदि पवित्र नदियों में स्नान का महात्म होने से बड़ी संख्या में लोग आस्था की डुबकी लगाने पहुंचते हैं।
गौरतलब है कि मेला क्षेत्र में घना कोहरा और हाड़कंपने वाली ठंड़ के बीच श्रद्धालुओं ने संगम में वृद्ध, युवा, बच्चे, महिलाएं एवं विकलांगों के हर-हर गंगे की ध्वनि स्नान घाट पर सुनाई पड़ रहा था। स्नान के बाद बुजुर्ग मां गंगा का दुग्ध अर्पण कर रहे थे तो महिलाएं कोहरे में छिपे भगवान भास्कर को अर्ध्य देकर परिवार के लिए सुख एवं समृद्धि के साथ देश में कोरोना से मुक्ति की कामना की।
पूजन अर्चन कर गृहस्थों ने स्नान कर घाट पर बैठे पण्डे और पुरोहितों को चावल, आटा, नमक दाल,तिल चावल और तिल से बने लड्डू आदि का दान किया। प्राचीन काल से संगम तट पर जुटने वाले माघ मेले वैश्विक महामारी के बाद भी जीवंतता में कोई कमी नहीं आयी है। मेले में आस्था और श्रद्धा से सराबोर पुरानी परम्पराओं के साथ आधुनिकता के रंगबिरंगे नजारे दिखायी पड रहे हैं। भारतीय संस्कृति और आध्यात्म से प्रभावित कई विदेशी भी इस दौरान पुण्य लाभ के लिए संगम स्नान करते दिखायी दे रहे हैं।
एक तरफ जहां तीन नदियों का संगम है वहीं दूसरी तरफ तम्बुओं के अन्दर से आध्यत्म की बयार बह रही है। चारों ओर धार्मिक अनुष्ठानों के मंत्रोच्चार और हवन में प्रवाहित की जा रही सामग्रियों की भीनी भीनी खुशबू मेला क्षेत्र के वातावरण को पवित्र और सुगन्धित कर रही है।
प्रयाग में कल्पवास की परंपरा सदियों पुरानी है। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने इसका प्रमाण इस चौपाई से दिया है कि “माघ मकरगत रबि जब होई तीरथपति आवै सब कोई। देव दनुज किन्नर नर श्रेनीं, सादर मज्जहि सकल त्रिबेनी।”
दिनेश विनोद
वार्ता

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