पिता के कंधों पर बैठ पहुंचे बाल सुलभ मन भी संगम स्नान को
प्रयागराज,16 फरवरी (वार्ता) अमृत से सिंचित और ब्रह्मदेव के यज्ञ से पवित्र तीर्थराज प्रयाग में चल रहे माघ मेला में श्रद्धालुओं के साथ.साथ आस्था की डगर पर चलकर नन्हे नन्हे कदम भी त्रिविधि ताप.पाप नाशिनी संगम में पुण्य की डुबकी लगाने पहुंचे।
राष्ट्रकवि के नाम से सर्वप्रथम अभिहित स्वतंत्रता आंदोलन युग की विराट हस्ती सोहनलाल द्विवेदी की कविता “चल पड़े जिधर दो डग.मग में चल पडे कोटि पग उसी ओर, गड गई जिधर भी एक दृष्टि गड़ गए कोटि दृग उसी ओर।” संगम में पहुंचने वालों को चरितार्थ कर रही है। नन्हे नन्हे दो डग भरने में असमर्थ पवित्र बाल सुलभ मन बिना किसी कामना के संगम में स्नान करने पिता के कंधे पर पहुंचे हैं।श्रद्धालु तो कामना लेकर पतित पावनी गंगा, श्यामल यमुना और पौराणिक यमुना में डुबकी लगा रहा थे लेकिन छोटे.छोटे बच्चे भी परिजनों के साथ पुण्य के भागीदार बने।
संगम तट पर तड़के सांय.सांय चल रही ठंडी हवाएं भी नन्हें कदमों के हौसलों को तोड़ने में नाकाम साबित हुयी। माघ मेले के चौथे स्नान पर्व बसंत पंचमी के अवसर पर मध्य प्रदेश के रींवा जिले से अपने परिजनों के साथ दीपक और मोहन भी संगम में आस्था की डुबकी लगाने पहुंचे।
दीपक के पिता अरविंद देशमुख ने बताया कि घर के लोग जब संगम स्नान को आने लगे तब दीपक को किसके हवाले छोड़ते, इसलिए साथ में इसे भी स्नान कराने लेते आए। अभी दीपक को यह ज्ञात नहीं कि वह माघ मेले के संगम में स्नान करने आया है। उसे इसकी महत्ता भी नहीं पता। दीपक ने कहा मेला घूमने बापू के साथ आए हैं।
मोहन के पिता ने बताया रधई ने बताया कि वे लोग बस से यहां पहुंचे। बस ने काफी दूर उतार दिया। पैदल ही चलकर संगम तक पहुंचना पड़ रहा है। दोनो बच्चे मेला देखने को लेकर इतना अधिक उत्सुक हैं कि उनको भूख प्यास की परवाह भी नहीं है। बच्चे अधिक दूर पैदल नहीं चल पातेए उनके पैर दर्द करने लगते हैं तब कंधे पर बैठाते हैं।
रधई ने बताया कि गंगा मइया का प्रताप है कि बिना आमंत्रण और निमंत्रण के सैकडों किलोमीटर दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। गंगा मइया जिसको बुलाना चाहती हैए किसी भी बहाने से बुला ही लेती हैं। उनकी महिमा वहीं जानें। दीपक और मोहन की तरह सैकडों बच्चे अपने परिजनों के साथ संगम में पुण्य की डुबकी लगाने पहुंचे हैं। कुछ बच्चे तो इनसे भी छोटे हैं जिन्हे स्नान नहीं कराया जा सकता लेकिन परिजन गंगाजल का उनके सुख, समृद्धि, उज्ज्वल भविष्य और बेहतर स्वास्थ्य के लिए उनके माथे पर अवश्य परिजन लगाते हैं।
उन्होने बताया कि संगम पर एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है। यहां किसी को किसी से कोई मतलब है, बस सब संगम में आस्था की डुबकी लगाने को अतुर दिख रहे हैं। लोगों को जिधर रास्ता मिल रहा है उधर से संगम की तरफ बढ़ रहे हैं। अपनों के बिछुडने के डर से एक दूसरे का हाथ या कपड़ा पकडे हुए हैं। किसी के मन में कोरोना का कोई भय नहीं है।
दिनेश प्रदीप
वार्ता

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