ओ री चिरैया कहां तू चली गई...

 मेरठ 20 मार्च (वार्ता) बढ़ती आबादी के दबाव में छोटे और पक्के मकानों ने गौरैया के घरौंदे को इस तरह नुकसान पहुंचाया कि वह आज लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है और उसकी चहचहाहट सुनने के लिये कान तरसने लगे हैं।

आम जुबान में गौरैया या चिरैया के नाम से जाने जानी वाली इस घरेलू चिड़िया ने इंसानों के साथ जीना सीख लिया था। साथ रहने से उसकी खाने पीने और अपनी आबादी बढ़ाने की तमाम जरूरतें जो पूरी हो रही थीं।
ग्यारह हजार साल के इस साथ में उस समय से विकट स्थिति आ गई जब तेजी से बढ़ती इंसानी आबादी की वजह से लोगों के रहने सहने का ढंग बदलने लगा। इसके नतीजे में छोटे पक्के मकानों ने बड़े और कच्चे मकानों की जगह ले ली। आंकड़े बताते हैं कि पिछले 40 साल में गौरैया की संख्या में करीब 60 प्रतिशत की कमी आई है।
विश्व गौरेया दिवस पर संस्था हरितिमा की ओर से आज यहां इंडियन मेडिकल एसोसिएशन हॉल में गौरैया संरक्षण पर एक कार्यक्रम किया गया। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र के मुख्य वन संरक्षक एनके जानू ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते
हुए गौरैया संरक्षण के लिये एक कार्य योजना की घोषणा की। उन्होंने कहा कि सिर्फ घोंसले बनाने से ही काम नहीं चलेगा बल्कि उनके लिये दाने और पानी की भी व्यवस्था की जानी चाहिये।
श्री जानू ने कहा कि अगर अब भी उपयुक्त कदम नहीं उठाया गया तो गौरैया की बातें दादी नानी की कहानियों तक ही सीमित रह जायेंगी। उन्होंने कहा कि इस छोटी चिड़िया के लुप्त होने से हमारा पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह बिगड़ जायेगा।
इस अवसर पर बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री साइंटिस्ट, मुम्बई के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा रजत भार्गव ने आवाहन किया कि आज हमें नन्हीं गौरैया को इस धरा पर चहकने के लिये एक आदर्श वातावरण देने का संकल्प लेना चाहिये। इस अवसर पर डा भार्गव की एक पुस्तक ‘ओ री चिरैया’ का विमोचन भी किया गया।
सं विनोद
वार्ता

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