वनटांगिया गांव में दीपोत्सव मनाते हैं योगी

 गोरखपुर, 02 नवम्बर (वार्ता) उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित कुसम्ही जंगल के वनटांगिया गांव जंगल तिकोनिया नम्बर तीन में पिछले ढायी दशकों से लगातार योगी आदित्यनाथ महराज वनटांगियां के लोगों के साथ दीपोत्सव में भाग लेते हैं इसलिए यहां के बुुजुर्ग अैर बच्चे भी बाबा योगी आदित्यनाथ के साथ गांव में दीये लेकर खुशियां मनाते हैं।

पिछले 100 साल से अधिक समय से यह गांव बदहाल और उपेक्षित था मगर गोरखपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हस्ताक्षेप से अब इस गांव की स्थितियाें में बड़ा बदलाव आ गया है। अब वनटांगियां समुदाय के नागरिकों को समाज की मुख्यधारा में जोडे जाने का श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी महराज को जाता है।


ऐसा गांव जहां दीपोत्सव पर ही दीप योगी बाबा के नाम से जलता है अैर दीपावली मनाने की परम्परा अब योगी बाबा के साथ जुड गया है। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दीपावली के दिन के आने की राह यहां के बुजुर्ग, बच्चे और पुरूष सभी शिद्दत से इंतजार कर रहे हैं।

इसके मद्देनजर तैयारियां जोरों पर हैं। प्रशासन तो लगा ही है, गांव के लोग भी अपने बाबा के स्वागत को घर.आंगन को सजाने.संवारने में जुटे है। ऐसा होना लाजिमी भी है, सौ साल तक उपेक्षित और बदहाल रहे वनटांगिया समुदाय को नागरिक का दर्जा देने से लेकर समाज व विकास की मुख्य धारा में लाने का श्रेय योगी आदित्यनाथ को ही तो जाता है।

लोग बताते हैं कि जब ब्रिटिश हुकूमत में जब रेल पटरियां बिछाई जा रही थीं तो स्लीपर के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों से साखू के पेड़ों की कटान हुई। इसकी भरपाई के लिए बर्तानिया सरकार ने साखू के नए पौधों के रोपण और उनकी देखरेख के लिए गरीब भूमिहीनों, मजदूरों को जंगल मे बसाया। साखू के जंगल बसाने के लिए वर्मा देश की वनटांगिया विधि का इस्तेमाल किया गया इसलिए वन में रहकर यह कार्य करने वाले वनटांगिया कहलाए। कुसम्ही जंगल के पांच इलाकों जंगल तिनकोनिया नम्बर तीन, रजही खाले टोला, रजही नर्सरी, आमबाग नर्सरी व चिलबिलवा में इनकी पांच बस्तियां वर्ष 1918 में बसीं। इसी के आसपास महराजगंज के जंगलों में अलग अलग स्थानों पर इनके 18 गांव बसे। 1947 में देश भले आजाद हुआ लेकिन वनटांगियों का जीवन गुलामी काल जैसा ही बना रहा। जंगल बसाने वाले इस समुदाय के पास देश की नागरिकता तक नहीं थी। नागरिक के रूप में मिलने वाली सुविधाएं तो दूर की कौड़ी थीं। जंगल में झोपड़ी के अलावा किसी निर्माण की इजाजत नहीं थी। पेड़ के पत्तों को तोड़कर बेचने और मजदूरी के अलावा जीवनयापन का कोई अन्य साधन भी नहीं। समय समय पर वन विभाग की तरफ से वनों से बेदखली की कार्रवाई का भय अलग से।

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