न्याय से न्यायिक सक्रियता की ओर : एक पहल




यतो धर्मस्ततो जयः यह संस्कृत श्लोक महाभारत से लिया गया है जिसका अर्थ है जहां धर्म होता है वही विजय होती है आज के समय में यह श्लोक भारतीय उच्चतम न्यायालय का सिद्धांत है। यहां धर्म का अर्थ न्याय एवं विधि से है जिसका मतलब है कि हमारे शास्त्रों में धर्म के शासन को प्राथमिकता दी गई है हमारी संस्कृति में शासक धर्म के प्रति कर्तव्यबद्घ होता है वो अपने दायित्वो का निर्वहन धर्म के अधीन करता है यदि वो उसके विपरीत जाएगा तो  उसे उसके दायित्वो से उन्मोचित कर देना चाहिए हमारे शास्त्रों एवं विधि शास्त्रियों ने हमेशा धर्म के प्रभुत्व को महत्त्व दिया है उसी प्रकार आज के समय में आज का धर्म संविधान हैं जो की खुद में एक संप्रभुत्व दस्तावेज है  भारत में इसकी संप्रभुत्वता को कायम रखने की जिम्मेदारी भारतीय न्यायालयों पर है। आज के समय में न्यायलयों पर सिर्फ न्याय करने का ही नहीं परंतु इस संविधान की आत्मा को तथा इसके उद्देश्यों को कायम रखने का भी भार है कई बार न्यायालयों को कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है इतिहास साक्षी रहा है की जब जब सरकारें शक्तिशाली हुई है तब तब उन्होंने संविधान के मूलाधार को क्षति पहुंचाई है तब न्यायालयों ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस संविधान को बचाया है साथ ही में न्यायलयों ने नागरिकों के हित में कदम बढ़ाते हुए कई बार अपने दायरे का विस्तार करते हुए नागरिकों के हितों की रक्षा की है जिसको आज के राजनीतिक विशेषज्ञ न्यायिक सक्रियता का नाम देते है और कुछ बुद्धिजीवी इसका खंडन भी करते है उनके द्वारा ये तर्क दिया जाता है की न्यायालय को इतनी शक्ति नही प्रदान होनी चाहिए की वो अपने दायरे से बाहर निकल कर शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त को हानि पहुंचाए परंतु वास्तविकता में ऐसा नहीं है,कानून की व्याख्या, आज के समाज में चल रहे मूल्यों और शर्तों के अनुसार की जानी चाहिए क्योंकि वे बदलते समाज के साथ बदलते रहते हैं। इसलिए, न्यायिक निर्णयों को इन परिवर्तनों को भी प्रतिबिंबित (रिफ्लेक्ट) करना चाहिए। जब सरकार की अन्य शाखाएं अपेक्षित तरीके से कार्य नहीं करती तो अदालतों को अन्याय को सुधारने के लिए अपनी शक्तियों का उपयोग करना चाहिए। हाल ही के कई मामले आए है जहा न्यायलयों ने संविधान एवं नागरिकों के हित की रक्षा हेतु विधायिका एवं कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप किया है चाहे वह लखीमपुर कांड हो जिसका स्वयं उच्चतम न्यायलय ने संज्ञान लिया या वो राजद्रोह के अंग्रेजी हुकूमत के कानून पर प्रश्न उठाना हो या संक्रमण के दौरान नागरिकों के हितों की रक्षा हो या विधायिका द्वारा निर्मित विधियों में पारदर्शिता का मामला हो न्यायलयों ने हमेशा आगे आकर नागरिकों के हितों  की रक्षा न्यायिक सक्रियता के माध्यम से की है। हाल ही में, राष्ट्र ने काफी हद तक लाभकारी ज्यूडिशियल एक्टिविज़्म के उदाहरण देखे हैं। एक उच्च-प्रोफाइल राजनेता शिबू सोरेन को 1994 हत्या का दोषी ठहराया गया है। टिनसेल के विश्व प्रसिद्ध गांधीगिरी के संजय दत्त को 1983 के आर्म एक्ट के तहत दोषी ठहराया गया था। नवज्योत सिद्धू, एक पूर्व-क्रिकेटर (एक्स क्रिकेटर), जिसे गैब से उपहार मिला था, को 18 साल पहले की गई सड़क तीव्रता (रोड रेज) हत्या का दोषी ठहराया गया था। ज्यूडिशियल एक्टिविज़्म की आलोचना (क्रिटीसिज़्म) चाहे जो भी हो, इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि ज्यूडिशियल एक्टिविज़्म ने देश में जनता की स्थिति को सुधारने के लिए बहुत कुछ किया है।

यह राज्यों और व्यक्तियों दोनों द्वारा की गई कई हर तरह की गलतियों को सुधारता है। न्यायपालिका के सुस्त (स्लगिश) कामकाज के कारण आम लोग कानून के संरक्षण से सबसे अधिक वंचित हैं, जिसे न्यायिक जड़ता या कानूनी मंदता (टार्डिनेस) भी कहा जाता है। ज्यूडिशियल एक्टिविज़्म ने भी इन सामयिक विपथन (ऑकेजनल एब्रेश़न) को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसे केवल ईमानदार और मुखर (वोकल) न्यायिक वकालत से ही आगे बढ़ाया जा सकता है, न कि न्यायपालिका को जनता की नज़रों में नीचे खींचकर। न्यायपालिका के कवच (आर्मर) में सबसे बड़ी संपत्ति और सबसे मजबूत हथियार वह विश्वास है जो वह आज्ञा देता है और जो लोगों के मन में समान रूप से न्याय करने और किसी भी विवाद में तराजू को संतुलन में रखने की क्षमता के लिए प्रेरित करता है।
आशुतोष कुमार सिंह
विधि छात्र 
गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर।

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