‘ईज ऑफ़ डूइंग वरशिप’ के विचार ने दिया काशी को नया कलेवर
वाराणसी, 08 दिसंबर (वार्ता) उत्तर प्रदेश की शाश्वत नगरी काशी अपना कलेवर बदल रही है। भारत की धर्मप्राण जनता ही नहीं वरन पूरी दुनिया इस प्रकाश नगरी के नये रूप का 13 दिसंबर को दर्शन करेगी जब प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी काशी विश्वनाथ धाम के नवनिर्मित परिसर का भक्तार्पण करेंगे। काशी के सुगम दर्शन पूजन (ईज ऑफ़ डूइंग वरशिप) के अनूठे विचार ने इस प्राचीन नगरी के कलेवर को मौलिक स्वरूप देने की प्रेरणा दी। अब काशी अधिपति शिव और मां अन्नपूर्णा, उत्तरवाहिनी गंगा से सीधे जुड़ जायेंगे।
इतिहास के उतार-चढ़ाव, ध्वंस और सृजन के साक्षी रहे भगवान शिव के इस अधिष्ठान का यह कायाकल्प करीब 250 वर्ष बाद साकार हो रहा है। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने धर्मांध मुग़ल शासक औरंगजेब के फरमान से ध्वस्त किये गए काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया था। महारानी के भगीरथ प्रयास से ज्ञानवापी मस्जिद की बगल के ध्वंसावशेषों ने वर्ष 1777-80 में एक छोटे लेकिन आभायुक्त मंदिर का रूप ले लिया था।
प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद वर्ष 2014 में काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन के लिए आये थे। वीआईपी प्रबंधों के कारण आमतौर पर कोई विशिष्ट व्यक्ति शायद ही आम भक्त की परेशानी का अनुमान लगा पाए। लेकिन मोदी ने यह सही आकलन किया कि आम दिनों में सामान्य श्रृद्धालु को मंदिर परिसर तक पहुंचने और दर्शन-पूजन करने में कितनी परेशानी होती होगी।
गंगा स्नान और काशी विश्वनाथ का दर्शन-पूजन करने के लिए देश-विदेश से काशी आये भक्तों को सीमित समय में अपनी चिर अभिलाषा को पूरा कर पाना एक विषम चुनौती जैसा था। इसी पृष्ठिभूमि में मोदी के मन में “ईज ऑफ़ डूइंग वरशिप (सुगम दर्शन पूजन) का विचार उपजा। यह संयोग है कि 118 वर्ष पूर्व दक्षिण अफ्रीका से आये एक अनजान गुजराती बैरिस्टर को काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन करने में ऐसी ही दिक्कत पेश आई थी। मंदिर में गंदगी, दुर्व्यवस्था और पंडो के लालची व्यवहार से वह क्षुब्ध हो गया था। भारत में उस समय अनजान यह भक्त महात्मा गाँधी थे। बापू की यह सोच थी कि गंदगी, दुर्व्यवस्था और लालची मनोवृत्ति के बीच आध्यात्मिक अनुभूति और आत्मिक शांति महसूस नहीं की जा सकती। बापू की इस सीख को जमीन पर उतारने की पहल एक अन्य गुजराती नरेंद्र मोदी ने की।
किसी प्राचीन नगर में कोई बदलाव या सुधार का काम बहुत मुश्किल होता है। इसमें परम्परा के साथ खिलवाड़ करने का सवाल भी पैदा होता है। एक बड़ा तबका ऐसा भी होता है जो अपने स्वार्थों के कारण यथा स्थिति बनाये रखना चाहता है। इन सभी कठिनाइयों और दवाबों के बीच मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट काशी विश्वनाथ धाम का पूरा होना काशीवासियों के लिए एक सपने जैसा है।
वास्तव में आपातकाल (1975-77) के दौरान मंदिर तक जाने वाले प्रमुख रास्ते विश्वनाथ गली को चौड़ा करने का सुझाव रखा गया था। इमरजेंसी के जोर जबरदस्ती के दौर में भी यह सुझाव क्रियान्वित नहीं किया जा सका। वर्ष 1983 में मंदिर में हुई स्वर्ण चोरी की घटना के बाद राज्य सरकार ने मंदिर का अधिग्रहण कर लिया। अधिग्रहण के लिए मंदिर में सुव्यवस्था और सुविधापूर्ण दर्शन-पूजन को मुख्य आधार बनाया गया। लेकिन पिछले तीन-चार दशकों में मंदिर तक आसान पहुँच और आसपास नागरिक सुविधाओं को कायम करने की दिशा में कोई ख़ास काम नहीं हो पाया। वर्ष 1992 में अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद काशी विश्वनाथ मंदिर एवं ज्ञानवापी मस्जिद परिसर की सुरक्षा स्थानीय प्रशासन के लिए मुख्य चुनौती बन गयी। मंदिर की ओर जाने वाले सभी रास्तों पर मेटल डिटेक्टर के साथ ही सुरक्षा बलों की तैनाती की गयी। ज्ञानवापी मस्जिद वाले रास्ते पर वाच टावर के साथ ही 24 घंटे की सुरक्षा व्यवस्था की गयी। सुरक्षाकर्मियों और उनके वाहनों के कारण संकरे और जीर्ण शीर्ण मकानों से घिरे इस क्षेत्र में दर्शनार्थियों की कठिनाइयां और बढ़ गयीं।
कालचक्र घूमा और काशी को अतीत की तरह फिर राज्याश्रय हासिल हुआ। काशी के निर्माण में पूरे देश के धर्मनिष्ठ लोगों और राजाओं का योगदान रहा है। कालांतर में यह राज्याश्रय समाप्त हो गया। देश में नयी राजनीतिक सत्ता ने दुनिया की इस प्राचीनतम नगरी की ओर ध्यान दिया। केंद्र में मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के बीच आपसी तालमेल से काशी विश्वनाथ धाम परियोजना को युद्ध स्तर पर पूरा किया। फरवरी 2020 में शुरू की गयी यह परियोजना रिकॉर्ड समय में पूरी की गयी।
काशी विश्वनाथ मंदिर अब एक खुला विस्तृत धर्म क्षेत्र है। मंदिर पतितपाविनी गंगा के तीन घाटों ललिता, मणिकर्णिका और जलासेन से सीधे जुड़ गया है। इस गलियारे में दर्शनार्थियों के लिए विभिन्न सुविधाओं का सृजन किया गया है। मुख्य मंदिर परिसर के सामने मंदिर चौक है। तीन यात्री सुविधा केंद्र और भोगशाला के साथ ही आगे के रास्ते के दोनों ओर वैदिक केंद्र, आध्यात्मिक पुस्तक भंडार, नगर संग्रहालय, मुमुक्ष भवन, वाराणसी गैलरी, मल्टी परपज सभागृह, पर्यटक सुविधा केंद्र, कैफेटेरिया और अतिथि गृह बनाये गए हैं। गंगा घाट पर नदी के पानी में जाने के लिये लकड़ी का छोटा पुल (जेटी) भी होगा। काशी विश्वनाथ धाम के लिए भूमि खरीद हेतु करीब 500 करोड़ रुपये की धनराशि व्यय हुई। परियोजना पर 350 करोड़ रुपये खर्च हुए। आने वाले दिनों में बड़ी संख्या में श्रृद्धालुओं के आने और धार्मिक पर्यटन से इस धनराशि के व्यय का औचित्य सिद्ध होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो ड्रीम परियोजनाएं थीं। इनमें से एक वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम का निर्माण तथा देश की राजधानी दिल्ली में सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट है। दुर्भाग्य से इन दोनों परियोजना को लेकर विवाद खड़ा किया गया और कानूनी लड़ाई भी छेड़ी गई। लेकिन सारी बाधाओं को दूर करते हुए काशी विश्वनाथ धाम परियोजना अब साकार हो गई है।
प्रशासन ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि नया निर्माण होते समय इस क्षेत्र के धार्मिक और आध्यात्मिक स्वरूप को पूरी तरह सुरक्षित रखा जाए। जिन भवनों को ध्वस्त किया गया है वहां मिले छोटे मंदिरों और देवी-देवताओं के विग्रहों को सुरक्षित रखा गया है तथा पूरे विधि विधान से उन्हें प्रतिष्ठित किया जा रहा है।
भगवान शिव संहार के देवता हैं। यह जीवन का सत्य है कि संहार और सृजन साथ साथ चलते हैं। काशी विश्वनाथ धाम इसका एक जीता जागता रूप है। कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि यह दुनिया के लिए तीर्थयात्रा के साथ ही धार्मिक-आध्यात्मिक पर्यटन का एक मॉडल बन जाये।
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