काशी में ब्राह्मण भरेंगे हुंकार, चाबी होगी उनकी चाहे जो बने सरकार

 लखनऊ 15 दिसंबर (वार्ता) उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले देश की सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर विश्व विख्यात वाराणसी में गुरुवार को ब्राह्मण महासम्मेलन के जरिये एकजुटता का प्रदर्शन करने के साथ साथ सियासत में अपने दखल का अहसास करायेंगे।

रूद्राक्ष कन्वेन्शन सेंटर में ब्राह्मणों के इस महासम्मेलन में 1200 ब्राह्मण इकट्ठा हो रहे हैं जो सबसे पहले लोकहित सप्त समिति तय करेंगे। इस समिति में 50 ब्राह्मण होंगे। यही समिति समाज की दशा और दिशा पर विचार करेगी और ब्रह्मादेश को कार्यान्वित कराएगी। इसके लिए समिति परस्पर परामर्श से ब्राह्मण समाज के सारथी का चयन करेगी। इस लोकहित सप्त समिति में गायत्री, भारती, उसनिक, जगति, तृष्टप, अनुष्टप और पंक्ति शामिल हैं।

ओम श्री ट्रस्ट के ट्रस्टी अरूण कुमार दुबे ने बुधवार को कहा कि ब्राह्मणों में यह भाव जगा है कि अब तक केवल उनका उपयोग सरकार बनाने के लिए किया जाता रहा है। मंशा पूरी हो जाने के बाद सर्व समाज को प्रताड़ित करने का काम सरकारें करती रही हैं। ब्राह्मण समाज अब इस पर अंकुश लगाएगा। यह काम ब्रह्मादेश के जरिए होगा, जो सारथी जारी किया करेंगे। मकसद यह है कि सरकार की मति कुमति ना हो। ’

समाज का मानना है कि ब्राह्मण सदैव दूसरे को देने में विश्वास रखते हैं, मगर किसी का छीन कर नहीं। ब्रह्म विधान इसका सबूत है। ब्रह्मविधान हर व्यक्ति के लिए समानता, पानी, ऊर्जा, स्वास्थ्य और दवा तक पहुंच, सुरक्षा व सामाजिक सुरक्षा, न्याय, मुफ्त शिक्षा, ज्ञान, भोजन, किसानी, दक्षता, रोजगार, उद्यमिता, नेतृत्व और सेवा, विकास के अवसर और बाकी चीजें सुनिश्चित करता है। ब्राह्मण नेतृत्व को विश्वास है कि ब्राह्मणों की पुनर्एकजुटता से जातिवाद, नस्लवाद और भ्रष्टाचार का भी अंत होगा।

उन्होने कहा कि ब्राह्मण समाज यह महसूस कर रहा है कि राजनीतिक दल स्वयं को विधाता मान कर राज करने की दिशा खो चुके हैं। इसलिए शासन को ब्रह्मविधान के अनुरूप निर्देशित करने की जरूरत है। ब्राह्मण समाज का मानना है कि समाज के हर वर्ग को स्वाभाविक रूप से फलने-फूलने का अवसर ब्रह्मविधान देता है। सृष्टि के आरंभ से ही ब्रह्मविधान समाज का हिस्सा रहा है। ब्रह्मविधान राजनीतिक विषय नहीं है।

दुबे ने कहा कि वर्तमान में ब्राह्मण निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की संख्या कम नहीं है और वे राजनीति के शीर्ष पदों पर भी हैं लेकिन ब्राह्मण समाज का मानना है कि ये आंकड़े मात्र हैं। समस्या यह है कि आज लोकतन्त्र को निजी मानकर चलाया जा रहा है। अतीत में जब ब्रह्मविधान था तब प्राकृतिक संसाधनों पर आम लोगों का अधिकार हुआ करता था और उनका इस्तेमाल केवल समाज के विकास के लिए किया जा सकता था। वातावरण प्रदूषित ना हो, इसकी भी चिंता समाज को हुआ करती थी। मानव इतिहास का स्वर्ण युग का आधार नैतिक और बौद्धिक स्तर रहा था।

उन्होने कहा कि आदिकाल से ब्राह्मण ज्ञान, धर्म और संस्कृति के रक्षक-संरक्षक रहे हैं और देश में शांति, सौहार्द, खुशी, सुरक्षा, समृद्धि और प्रगति को सुनिश्चित करने में ब्राह्मणों की भूमिका सवालों से परे है। आज जो दुर्दशा देखने को मिल रही है उसका मूल कारण नेतृत्व से ब्राह्मण समाज का दूर होना है। नेतृत्व, प्रशासन, व्यवसाय और आम तौर पर पूरे सभ्य समाज का नेतृत्व ब्राह्मणों ने किया है।

लोकहित सप्तसमिति की बैठकों में मनमंथन से सामूहिक विवेक से ब्रह्मादेश आता है। हर ब्रह्मादेश शानदार भविष्य की दिशा में साझा संकल्प है जो जनता के सामूहिक विवेक को तैयार करता है। इसमें विभिन्न आवाज, सोच, दिमाग, नीति, आशा और उम्मीदें शामिल हैं।

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