वेद वाणी
वेद वाणी
मैं प्रभु का सच्चा उपासक बनूं, यही सत्य मार्ग है!
(अर्चन्त्यर्क मरुत: स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्र:!)४४५-९
व्याख्या अर्क शब्द का अर्थ परमात्मा है इसका अर्थ मंत्र है इसका अर्थ अन्न है!इस प्रकार स्वर्का: सर्वोत्तम उपास्य देव का उत्तम मन्त्रों से अर्चना करने वाले मरूत:अकर्म अर्चन्ति मनुष्य उस उपास्य देव प्रभु की अर्चना करते हैं!यह एक इत् हव्यश्चर्षणीनाम् इत्यादि मन्त्रों में मनुष्य के लिए एकमात्र उस प्रभु की उपासना का ही निर्देश है!
जो मनुष्य सात्विक भोजन का सेवन करते हैं और जिनका ज्ञान उत्तम होता है उनका जीवन इस उपासना से ओत-प्रोत होता है!
ऐसा होने पर वह परमात्मा जो अशुभ को दूर करने वाला है और शुभ को प्राप्त कराने वाला है प्रसिद्ध है और इनके सब कष्टों को रोकता है! प्रभु कृपा से न इन्हें आध्यात्मिक कष्ट पीड़ित करते हैं और न ये भौतिक कष्टों के शिकार होते हैं! और न ही इन्हें आधिदैविक कष्टों का प्रकोप से सहना पड़ता है
मन्त्र का भाव है कि- मैं प्रभु का तथा सत्य मार्ग का अनुगामी बनूं
सुमन भल्ला
द्वारका दिल्ली
(वेद प्रचारिका महर्षि दयानंद सेवा समिति)

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