वेद वाणी
वेद वाणी
हमारा लक्ष्य विकास हो, हम वाजी बनें प्रभु की प्रेरणा को सुनें, वासनाओं को नष्ट करके स्वर्ग के विजेता बनें
( आविर्मर्या आ वाले वाजिनो अग्मं देवस्य सवितु: सवम् ! स्वर्गा अर्वन्तो जयत! ) ४३५-९
व्याख्या प्रभु कहते हैं कि
हे मनुष्यों! तुम अपना विकास करो! उन्नति यह तुम्हारे जीवन का लक्ष्य- शब्द हो! उन्नति का स्वरूप यह है कि तुम यह निश्चय करो कि उस वाजी के वाज को प्राप्त होऊं! विज्ञानमय कोश में मैं उस वाजी - ज्ञान स्वरूप प्रभु के ज्ञान को प्राप्त करूँ! मनोमय कोश में मै उस वाजी - त्याग के पुञ्ज उस प्रभु के वाज त्याग को अपनाऊँ! प्राणमय कोश से उस वाजिन: शक्तिमय प्रभु की वाज शक्ति को धारण करूँ
और अन्नमय कोश में वाजिन:- उस स्वाभाविक क्रिया वाले प्रभु की वाज क्रिया को मैं भी अपना स्वभाव बनाऊँ! इसके लिए मैं उस देवस्य सवितु: सवम् अग्मन्! सारी दिव्यता के निधान सदा प्रेरणा देने वाले प्रभु की प्रेरणा को प्राप्त होऊं सुनने वाला बनूँ! विकास व उन्नति को लक्ष्य बनाना प्रथम पग है! उस विकास का स्वरूप है! वाज को प्राप्त करना! उस वाज की प्राप्ति के लिए प्रभु प्रेरणा को सुनना दूसरा पग है! इस प्रेरणा को सुनने वाला व्यक्ति अर्वन् होता है! यह क्रोधादि वासनाओं का संहार करता है! और अर्वन्त: कामादि का संहार करते हुए तुम लोग स्वर्ग जयत स्वर्ग को जीतने वाले बनो! पारलौकिक स्वर्ग की बात का न भी ध्यान करें मनुष्य ऐहलौकिक स्वर्ग का लाभ तो कर ही लेता है! क्रोधादि से ऊपर उठ जाने पर मनुष्य का जीवन कितनी अद्भुत शक्ति वाला हो जाता है! वासनाओं को जीते बिना मनुष्य की सुखमय स्थिति कभी नहीं हो सकती है! इसलिए आवश्यक है कि हम विकास को जीवन का लक्ष्य बनाकर वाज को प्राप्त करने वाले बनें!
मन्त्र का भाव है कि- हमारा लक्ष्य विकास हो हम प्रभु प्रेरणा को सुनकर वासनाओं को नष्ट करके विजेता बनें
सुमन भल्ला
द्वारका दिल्ली
(वेद प्रचारिका महर्षि दयानंद सेवा समीति)

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें