वेद वाणी

 वेद वाणी 

प्रभु कृपा से मेरा मन स्तुति प्रार्थना उपासना में ही तल्लीन रहें जिससे हम प्रभु प्राप्ति में संलग्न रहे!

(उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्त: पुष्येम रयिं धीमहे त इन्द्र!)४४४-८

व्याख्या प्रक्ष का अर्थ है निवास का प्रकृष्ट स्थान केवल निवास ही नहीं यह शब्द यह निर्देश कर रहा है कि इस शरीर मे हमारा उत्तम निवास हो और हम सदा गतिशील हो! इस प्रश्न को हम गतिशील बनायें इस प्रक्ष को हम मधुमान बनायें! हमारा सारा व्यवहार माधुर्य को लिए हुए हो! मधुमन्मे निक्रमणं मधुमन्मे परायणम् मेरा आना जाना भी माधुर्य के लिए हो!इस मधुमति प्रक्षे माधुर्यमय शरीर में निवास करते हुए  हम गतिशील रहते हुए धनों का पोषण करे! हे प्रभु! हम आपका ध्यान धरें और आपको धारण करें!

हम गतिशील रहते हुए धन कमायें इस वाक्य का अभिप्राय स्पष्ट है कि हम पुरूषार्थ प्राप्त धन को ही उपादेय मानें!यह। धन हमारे जीवनों में किसी प्रकार के धब्बों को लगाने वाला न हो जाए इसलिए हम प्रभु का ध्यान व उसे धारण करें!

धन सम्पन्न प्रभु भक्त गृहस्थ कितना सौभाग्यशाली है? धन से उसके सब कार्य चलते हैं और प्रभु भक्ति उसे हानि नहीं होने देती! प्रभु भक्ति धन की हानियों का प्रतिकार है! 

मन्त्र का भाव है कि- उपासना के निम्न लाभ हैं 

१- प्रभु प्राप्ति २- इन्द्रियों का मार्ग से विचलित न होना ३- शरीर में उत्तम गतिशील ता! ४- माधुर्य ५- ऐश्वर्य लाभ      ६- दिव्यता का धारण

प्रभु भक्ति में सदा मेरा मन लगा रहे!


         सुमन भल्ला

         द्वारका दिल्ली

  (वेद प्रचारिका महर्षि दयानंद सेवा समिति)

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