वेद वाणी

 वेद वाणी

हम सोम के सेवन से ही कान्तिसम्पन्न, आगे बढने वाले, प्रभु के साथ रहने वाले उस प्रभु के सच्चे सेवक बनें रहें! 

(क ई व्यक्ता नर: सनीडा रूद्रस्य मर्या अथा स्वश्वा:) ४३३-७

व्याख्या सोम के प्रभाव से अपने को श्री सम्पन्न व उर्जा वाले बनाकर ये लोग जब समाज में लोक संग्रह के लिए विचरते है, तब सामान्य जनता कह उठती है- के ईम् व्यक्ता: नर: सनीडा: रुद्रस्य मर्या: अथ स्वश्वा: कौन है ये? ये सचमुच अद्भुत कान्ति वाले नियमित रुप से अपने आगे और आगे प्राप्त कराने वाले प्रभु के साथ एक ही निवासस्थान में रहने वाले सबको उपदेश देने वाले प्रभु के ही मनुष्य और सबसे बड़ी बात यह कि उत्तम इन्द्रियों रुपी घोड़े वाले है! 

सोम के पान ने इनके जीवन में उपर्युक्त अद्भुत प्रभाव उत्पन्न किये है! इन प्रभावों के कारण सामान्य जनता की दृष्टि में ये अतिमानव बन जाते हैं! ये प्रकृति के उपासक न होकर प्रभु के उपासक होतें है! इसी कारण प्रकृति का अन्याय्य प्रयोग नहीं करते हैं! अपने को प्रभु का निमित्त मात्र मानते हैं! प्रकृति के उपासक तो बनते ही नहीं! 

इसी बात को मन्त्र में रुद्रस्य मर्या: शब्दों से कहा गया है! इन्द्रियों पर पूर्ण प्रभुत्व पाकर ही मनुष्य परमेश्वर का होता है! ये प्रभु भक्त वसिष्ठ और मैत्रीवरुणि है! मन्त्र का भाव है कि- प्रभु के सम्पर्क में रहकर कान्तिमान आगे बढने वाले प्रभु के सच्चे उपासक व सेवक बनें


 सुमन भल्ला

  द्वारका दिल्ली

(वेद प्रचारिका महर्षि दयानंद सेवा समीति)

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