वेद वाणी

 वेद वाणी 

ब्राह्मी भाव में शान्ति की प्राप्ति होती है यह भाव लोकहित में रत होने से प्राप्त होता है,उसी भूतहित का प्रतीक दान है! दानी निष्पाप होता है,देव बनता है और महादेव को प्राप्त करता है!

(शं पदों मघं रयीषिणे न काममव्रतो हिनोति न स्पृशद्रयिम्!४४१-५

(सदा गाव:शुचयो विश्वधायस: सदा देवा अरेपस:!)४४२-६

व्याख्या मघं शं पदम् रयीषिणे निर्मल ऐश्वर्य से पूर्ण शान्ति के स्थान को धन को दे डालने वाले दानी प्राप्त करते हैं! पूर्ण शान्ति ब्रह्म को वहीं प्राप्त करता है जो धन के प्रति आसक्त नहीं होता है! जो भी व्यक्ति अव्रत:कामम् न हिनोति 

इस दान के व्रत को धारण नहीं करता है वह कामम् न हिनोति बेशक कितना भी हाथ पैर मारे इस शान्ति के पद को प्राप्त नहीं करता! धन संग्रह में शान्ति है भी तो नहीं!यह अव्रत पुरुष उस ऐश्वर्यपूर्ण शांत स्थान को प्राप्त भी क्योंकर करें, इसने धन का दान भी तो नहीं किया! यदि मनुष्य धन का दान भी करें प्रकृति में आसक्त न हो तभी उस शान्त पद को प्राप्त कर सकता हैं!

देवा: सदा अरपेस: देने वाले हमेशा निष्पाप होते हैं!

दान देना,दान खण्डन,दान शोधन!दान शब्द के उल्लिखित तीन अर्थ ही दान की निष्पापता को जन्म देने वाली शक्ति को व्यक्त करते हैं!लोभ सब पापों का मूल है! दान उस मूल पर कुठाराघात करता हुआ पापों का उन्मूलन कर देता है!इस बात को वेद एक उदाहरण से भी इस रुप में व्यक्त करता है कि - गाव: सदा शुचय: गौएं हमेशा पवित्र है ,इनका मल मूत्र भी 

कृमि घातक होकर शोधक हो जाता है! गोमूत्र कितने ही रोगों को दूर करता है,गोमय (गोबर) किस प्रकार यज्ञवेदि के नैर्मल्य का कारण बनता है!गौरवों की इस पवित्रता का हेतु भी वेद के दृष्टिकोण में यही है कि ये विश्वधायस: सभी को दूध पिलाकर पालने वाली है! गौवें जीवन देती है देने से पवित्र हैं! इसी प्रकार मनुष्य भी दान देने से देव बनता है पवित्र बनता है और निष्पापता का लाभ करता है यह निष्पापता ही उसके ब्राह्मी भाव का कारण बनेगी! 

मन्त्र का भाव है कि- हम दान देकर सर्व लोकहित में लगें रहे दानी निष्पाप होता है देव बनता है और तब महादेव को प्राप्त करता है


          सुमन भल्ला

         द्वारका दिल्ली

   (वेद प्रचारिका महर्षि दयानंद सेवा समिति)

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