वेद वाणी
वेद वाणी
मै कुटिलता को दूर करने के लिए द्वेष भाव से ऊपर उठूं
द्वेष से उपर उठने के लिए मै तीन भावनाओं को अपने अंदर समान रुप से प्रबुद्ध करूँ! दान, मित्रता, व्रतित्व!
(न तंमहो न दुरितं देवा सो अष्टंगी मर्त्यम्! सजोषसो यमर्यमा मित्रो नयति वरुणो अति द्विष:
४२६-८
व्याख्या जिसने कुटिलता को दूर भगा दिया, जो सुन्दर दिव्य गुणों वाला होने से वामदेव्य है! परिणामतः यह दुर्गति से भी दूर है! यह कहता है कि- हे देवों! तम् मर्त्यम् न अहं न दुरितम् अष्ट यम् अर्यमा मित्र: वरुण: सजोषस: द्विष: अति नयति उस पुरुष को न तो कुटिलता न ही दुर्गति व्याप्त करती है! जिसे अर्यमा मित्र वरुण समान रुप से प्रीति पूर्वक सेवन करते हुए द्वेष की भावनाओं से पार ले जाते हैं! कुटिलता और दुर्गति में कार्य कारण भाव है! कुटिलता कारण और दुर्गति उसका कार्य है! सर्वं जिह्यं मृत्युपदम् कुटिलता मृत्यु का मार्ग है इस कुटिलता से हमारा जीवन कडवा बना है
सरलता उसमें माधुर्य लाती है! कुटिलता से हम दूर तभी होंगे जब द्वेष की भावना से उपर उठेंगे! इस द्वेष की भावना से उपर उठने के लिए निम्न तीन बातें जीवन में होनी ही चाहिए!
१- अर्यमा यह दान की प्रवृत्ति का प्रतीक है!
२- मित्र यह शब्द स्नेह का सूचक है!
३- वरुण वरुण का पर्याय पाशी है! अपने को व्रतों में बंधने की भावना है
वस्तुतः दान, स्नेह व व्रतित्व की भावनायें हमें निर्द्वेष बनाती है! मित्र शब्द को मध्य में रखकर वेद ने यह संकेत दिया है कि मित्रता के लिए दान व व्रतित्व दोनों ही बातें आवश्यक है! संकट मे हम सदा मित्र को देने के लिए उद्यत रहते हैं! परन्तु उस मित्र को भी चाहिए कि वह अपने को इस प्रकार व्रतों के बंधन में बांधकर रक्खें कि प्रतिज्ञानुसार धन को लौटाने का ध्यान अवश्य ही करें! देने वाला दे और लौटाने वाला ठीक लौटाये तो मित्रता बढती है! लेन देन ही न हो तो मित्रता कैसी?
ददाति प्रतिगृह्याति ये तो छह लक्षण ही है! मन्त्र में कहीं वरुण पहले कही अर्यमा! मध्य में सदैव मित्र को ही रक्खा है! इसका अभिप्राय इतना ही है कि व्रतित्व व दातृत्व दोनों ही समान रुप से आवश्यक हैअन्यथा मित्रता कभी चल नहीं सकती है, पारस्परिक मित्रता जीवन को दुर्गति से बचाकर सुखमय बनाती है!
*मन्त्र का भाव यह है कि-
मैं कुटिलता व द्वेषभाव से उपर उठूं और फिर तीन भावनाओं को अपने अंदर समान रुप से प्रबुद्ध करूँ
दान मित्रता व व्रतित्व को जीवन का अंग बानाऊं*
सुमन भल्ला
(वेद प्रचारिका महर्षि दयानंद सेवा समीति)

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें