भारत के पास 25 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक महाशक्ति बनने की कुव्वत : अडानी
लखनऊ 07 अगस्त (वार्ता) देश के जानेमाने उद्योगपति गौतम अडानी ने भारतीय युवाओं को कठिन परिश्रम की राह चुनने की सलाह देते हुये कहा कि भारत 2030 तक दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है और उम्मीद है कि 2050 तक देश 25 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक महाशक्ति बन सकेगा।
भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) में आयोजित एक कार्यक्रम में श्री अडानी ने गुरुवार को कहा “ भारत आज उस कैनवास की तरह खड़ा है, जो असाधारण की दहलीज़ पर है। भाग्य की हवायें हमारे साथ हैं। यह उभार चार अडिग ताकतों से आ रहा है जिसमें पहली ताकत जनसांख्यिकी है। हम दुनिया की सबसे युवा, सबसे जिज्ञासु और सबसे महत्वाकांक्षी कार्यशील आबादी हैं। हम सिर्फ उपभोग नहीं कर रहे, हम दुनिया के लिए बाज़ार भी बना रहे हैं। 2030 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की रफ्तार पर हैं। जो आधार, यूपीआई और ओएनडीसी हमने बनाए हैं, वैसा कोई देश नहीं कर पाया। ये सिर्फ प्लेटफॉर्म नहीं हैं, ये समावेशन, नवाचार और विस्तार के लॉन्चपैड हैं। हमारे इतिहास में पहली बार, भारतीय पूँजी आत्मविश्वास, हिम्मत और अभूतपूर्व तत्परता के साथ भारतीय विचारों को समर्थन दे रही है।”श्री अडानी ने छात्रों से कहा “ मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि आपके सबसे उत्पादक वर्ष भारत के सबसे शक्तिशाली वर्षों के साथ मिलकर चलेंगे। आपका करियर और हमारा देश, साथ-साथ ऊँचाइयों को छुयेंगे। आप न तो 5 ट्रिलियन डॉलर की और न ही 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था देखेंगे। आप एक 25 ट्रिलियन डॉलर की महाशक्ति भारत को 2050 तक अपने सामने देखेंगे। दुनिया का गुरुत्वाकर्षण केंद्र बदलेगा और वह आपकी ओर खिंचेगा। भारत की ओर। और भले ही आपने दुनियाभर के लेखकों की किताबों से पढ़ाई की हो, याद रखिए, कुछ बातें ऐसी हैं, जो न तो किसी किताब में लिखी हैं और न ही कहीं सिखाई जा सकती हैं, वे सिर्फ भारतीयता में रची-बसी होती हैं। एक ऐसा विश्व जो युद्धों से टूटा हुआ है, प्रभुत्व की भूख से फटा हुआ है, उसमें भारत संयम के साथ अडिग खड़ा है।”
भारतीय युवाओं को संघर्ष से न डरने की सलाह देते हुये उन्होने कहा कि भविष्य कभी-भी उतना स्पष्ट और व्यवस्थित नहीं होता है, जितना वह क्लासरूम में दिखता है। असल ज़िंदगी में भविष्य उलझा हुआ होता है, अनिश्चित होता है और कई बार बेहद कठोर भी और युवाओं को इसी सच्चाई के लिए तैयार रहना चाहिये।
उन्होने कहा “ मैं सिर्फ प्रबंधन के छात्रों से नहीं, बल्कि उस नई पीढ़ी से बात कर रहा हूँ, जो आने वाले भारत की रूपरेखा तैयार करेगी। मुझे एक सपना नज़र आता है,सर्वश्रेष्ठ भारत का सपना। मुझे विश्वास महसूस होता है, उस भारत पर विश्वास, जिसे कोई रोक नहीं सकता लेकिन ये संभावना, ये सपना और ये विश्वास,आज की मुद्रा नहीं हैं। ये भविष्य का भरोसा हैं।”
श्री अडाणी ने कहा “ मैंने अब तक यही सीखा है और अब भी सीख रहा हूँ कि असली दुनिया ऐसे लम्हों से बनी होती है, जिनका कोई उदाहरण पहले नहीं होता। और जब ऐसे अप्रत्याशित पल सामने आते हैं, जब आँकड़ें स्पष्ट नहीं होते, जब बिजनेस मॉडल जवाब देने लगते हैं, और साथ ही जब आगे का रास्ता अनजान होता है, तब सफलता इस बात से तय नहीं होती कि आपने अपने केस स्टडीज़ कितनी अच्छी तरह पढ़ी थीं। सफलता तब तय होती है, जब आप खुद की कहानी को एक केस स्टडी बना सकें। इतिहास पहले से बने मॉडल्स को अच्छे से लागू करने से नहीं बनता। इतिहास बनता है, जब हम नया रास्ता बनाने की हिम्मत और नेतृत्व दिखाते हैं।”
उद्योगपति ने कहा “ वक्त की रेत पर चलने से इतिहास नहीं बनते बल्कि इतिहास वो बनाते हैं जो अपनी राह खुद तराशते हैं। उन्होने छात्रों से अपील की कि वे सावधानी के बजाए दृढ़ विश्वास चुनें, सुख-सुविधा के बजाए परिणामों की जिम्मेदारी लें,अनुकरण के बजाए निर्माण करें और सुविधाजनक रास्तों के बजाए अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर चलें।
उन्होने कहा “ जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो साफ समझ आता है कि मेरे हर सार्थक सफर में एक ऐसा मोड़ जरूर आया, जब संसाधन कम पड़ गए और साथ देने वाले हाथ छूट गए। लेकिन, एक चीज़ हमेशा मेरे साथ रही, यह दृढ़ यकीन कि मेरे साहसी सपने उस संघर्ष के काबिल हैं। मैं हमेशा मानता रहा हूँ कि जो भी चीज़ वाकई पाने लायक होती है, वह आपको आज़माएगी। वह आपके सुरक्षा घेरों को तोड़ेगी, आपकी धारणाओं को चुनौती देगी और तब आपसे यह माँग करेगी कि जब कोई और आप पर भरोसा न करे, तब आप खुद पर भरोसा करें। लेकिन, मैंने यह भी जाना है कि सबसे असाधारण ज़िंदगियाँ आसान फैसलों से नहीं बनतीं। वे तब बनती हैं, जब कोई व्यक्ति अपने आराम को छोड़कर अर्थ की तलाश में निकल पड़ता है। असली विकास वो नहीं जो सुविधा में पले, असली विकास वो है जो संघर्ष में तपे। वास्तविक विकास तब नहीं होता जब रास्ता स्पष्ट हो, बल्कि तब होता है जब आप तलाशते रहना और चलते रहना चुनते हैं, भले ही मंज़िल बहुत दूर ही क्यों न लगे। ”
श्री अडानी ने अपनी जीवनयात्रा का अनुभव साझा करते हुये कहा “ मेरी उद्यमशीलता की यात्रा 16 साल की उम्र में शुरू हुई, जब मैं अहमदाबाद छोड़कर मुंबई आ गया और हीरा व्यापार से जुड़ गया। यह मेरा पहला असली अनुभव था जोखिम उठाने, रिश्ते बनाने और वैश्विक नेटवर्क की ताकत को समझने का। करीब तीन साल बाद, मुझे वापस अहमदाबाद बुला लिया गया, ताकि मैं अपने भाई के पॉलिमर कारखानों को संभालने में मदद कर सकूँ। यहीं मैंने पहली बार विस्तार, लॉजिस्टिक्स और एक सिरे से दूसरे सिरे तक की आपूर्ति श्रृंखला की अहमियत को समझा। यही समझ आगे चलकर मेरे पूरे व्यावसायिक दृष्टिकोण की नींव बनी।”
उन्होने कहा “ इसके बाद भारत के बदलाव का एक ऐसा दौर आया, जिसने देश को तेज़ विकास की राह पर ला खड़ा किया। जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी और नरसिंह राव के नेतृत्व में भारत में उदारीकरण शुरू हुआ, तो मैंने देखा कि एक नई पीढ़ी के लिए एक बड़ा अवसर सामने है, उस बाज़ार में, जो अब तक मुख्यतः आपूर्ति की कमी से जूझता रहा था। मैंने एक बड़ा दाँव खेला और व्यापार जगत में कदम रखा। लक्ष्य था भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग हाउस बनाना। सिर्फ तीन वर्षों में हमने यह लक्ष्य हासिल कर लिया और 1994 तक, जब मैं 32 साल का था, मैंने कंपनी को पब्लिक कर दिया। आज वही कंपनी अदाणी एंटरप्राइज़ेज़ के नाम से जानी जाती है।”
श्री अडानी ने कहा “ 1994 की इस सफलता के बावजूद मुझे यह एहसास हुआ कि मेरे पास कोई भौतिक संपत्ति नहीं है और जब देश इंफ्रास्ट्रक्चर की क्राँति की शुरुआत कर रहा हो, तो यह मेरे लिए एक ऐसा अवसर था, जिसे नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। यह फैसला मैंने उसी वक्त ले लिया था कि मेरा अगला कदम सिर्फ ट्रेडिंग तक सीमित नहीं रहेगा। अब मेरा सपना इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का था और भारत की तरक्की की कहानी में एक भागीदार बनने का भी। लेकिन, जब मैंने पहली बार पोर्ट बनाने की मंशा जताई, तो ज्यादातर लोगों को लगा कि मैं अपना होश खो बैठा हूँ। सिर्फ इसलिए नहीं कि मैंने ज़िंदगी में एक भी ईंट नहीं लगाई थी, बल्कि इसलिए भी कि मैंने पोर्ट बनाने के लिए कच्छ क्षेत्र के मुंद्रा को चुना, जो कि भारत के सबसे बड़े दलदली इलाकों में से एक था।”
उन्होने कहा “ मुझे आज भी याद है, जब मैंने यह विचार बैंकर्स के सामने रखा, तो उनमें से कुछ हँसने लगे और बोले, मिस्टर अदाणी, आप हमसे ऐसी ज़मीन की फंडिंग कैसे चाह सकते हैं, जो पानी में डूबी है?" और वे गलत नहीं थे। मुंद्रा में न कोई रास्ता था, न कोई इंडस्ट्री, न ही कोई उदाहरण। यही वह पल था, जब मेरी पहली सोच- 'सावधानी से ज्यादा विश्वास' ने काम किया। क्योंकि मेरा विश्वास सिर्फ ज़मीन के लिए फंड माँगने का नहीं था। मैं तो उन्हें एक ऐसी संभावना के लिए तैयार करना चाहता था, जिसे अब तक किसी ने सोचा भी नहीं था।”
उद्योगपति ने कहा कि नक्शे आपको वहीं तक ले जाते हैं, जहाँ पहले कोई गया हो। लेकिन, यदि कुछ नया बनाना हो, तो आपको नक्शा नहीं, बल्कि ऐसा कम्पास चाहिए, जो संभावनाओं की दिशा दिखाए। दिशाएँ केवल वहाँ तक ले जाती हैं जहाँ कदमों के निशान पहले से हों लेकिन दृष्टि वहाँ ले जाती है जहाँ अभी किसी की कल्पना भी नहीं पहुँची और मेरे विश्वास की दिशा ने मुझे मुंद्रा तक पहुँचाया। एक समय दलदल रहा यह क्षेत्र, आज भारत का सबसे बड़ा व्यावसायिक पोर्ट है। यहीं से एक नई शुरुआत हुई। मुंद्रा अब अदाणी समूह के 21 पोर्ट्स और टर्मिनल्स के नेटवर्क का केंद्र बन चुका है, जो देशभर के 17 और विदेशों के चार स्थानों में फैले हुए हैं। आज अदाणी पोर्ट्स भारत के समुद्री व्यापार का लगभग 30 प्रतिशत संचालन करता है और 40,000 एकड़ में फैले भारत के सबसे बड़े औद्योगिक विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईज़ेड) को भी ऊर्जा देता है।
उन्होने कहा “ यही आत्मविश्वास मुझे अगली बार ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड ले गया। क्वींसलैंड मेरे 'दूसरे जीवन-सिद्धांत' की सुविधा नहीं, बल्कि 'परिणाम को प्राथमिकता' का सजीव प्रतीक बना। भारत में कोयले की कमी नहीं थी, लेकिन अच्छी गुणवत्ता वाले कोयले की थी। इसलिए यह परियोजना कोयले की लालसा से नहीं, बल्कि उस परिणाम से जन्मी, जो भारत को बेहतर गुणवत्ता वाला कोयला उपलब्ध कराना था। यह परियोजना उस परिणाम की उपज थी, जिससे कार्बन उत्सर्जन घटे और भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता सुनिश्चित हो। तब शायद हम अंदाज़ा नहीं लगा पाए थे कि कार्माइकल कोल माइन इस सदी की सबसे विवादास्पद ऊर्जा परियोजनाओं में से एक बन जाएगी। और यह तो हमारी अपनी ज़मीन पर भी नहीं थी। हम ऑस्ट्रेलिया में निर्माण कर रहे थे। एक ऐसा देश, जहाँ हमारे पास न कोई राजनीतिक पहुँच थी, न कोई ऐतिहासिक मौजूदगी और न ही कोई संस्थागत सहयोग। विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा था। वैश्विक पर्यावरण समूहों ने हमारे खिलाफ जबरदस्त अभियान छेड़ दिया, कई महाद्वीपों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए।”
श्री अडानी ने कहा “ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने हमें खलनायक बना दिया। बैंकों ने दबाव में आकर वित्तपोषण से हाथ खींच लिया। बीमा कंपनियों ने हमें कवर देने से इनकार कर दिया। कार्यकर्ताओं ने रास्ते रोके, कानूनी चुनौतियाँ पेश कीं और तो और, हमारी गतिविधियों को शारीरिक रूप से रोकने की कोशिश भी की। हमें अदालतों में घसीटा गया, संसदों में बहस हुई और अखबारों की सुर्खियों में आलोचना का निशाना बनाया गया। ज़मीन पर हमारे लोग लगातार उत्पीड़न झेलते रहे। हमारी अनुमति प्रक्रिया में देरी हुई, रेलवे परियोजना पर सवाल उठे, और उस भूमि पर हमारे अस्तित्व के अधिकार को भी चुनौती दी गई। जहाँ भी देखा, एक ही संदेश था, पीछे हटो। लेकिन, हम नहीं हटे। और आज हमारा कारमाइकल प्रोजेक्ट क्लीनर कोल से ऑस्ट्रेलिया की इंडस्ट्रीज़ को ऊर्जा दे रहा है, हज़ारों लोगों को रोज़गार दे रहा है, और एक ऐसा इंडो-ऑस्ट्रेलियन कॉरिडोर बना चुका है, जो व्यापारिक ही नहीं, रणनीतिक रूप से भी अहम् है।”
उन्होने कहा कि यह हमारी राष्ट्र की ऊर्जा सुरक्षा का प्रतीक है। और यह हमारे उस चयन का प्रतीक है, जिसमें हमने सुविधा नहीं, परिणाम को प्राथमिकता दी और इसी जज़्बे के साथ मैं पहुँचा खावड़ा- मेरे तीसरे सिद्धांत अनुरूपता नहीं, सृजन का साक्षी। अगर मुंद्रा नमक से भरी दलदली ज़मीन थी, तो खावड़ा दलदली ज़मीन के नीचे नमक से भरा रेगिस्तान था। यहाँ तक कि कहा गया कि यह ऐसा रेगिस्तान है, जहाँ ऊँट भी चलने से मना कर देते हैं।
उन्होने कहा “ विकास वही सच्चा है जो मानवता की बुनियाद पर खड़ा हो, नहीं तो वह केवल विस्तार है। मेरे लिए धारावी ईंट और सीमेंट का प्रोजेक्ट नहीं है। यह सुविधा नहीं, संवेदनशीलता का प्रोजेक्ट है। यह हमारे राष्ट्र की आत्मा के सामने रखा गया एक आईना है।
उन्होने कहा “ इसके बाद भारत के बदलाव का एक ऐसा दौर आया, जिसने देश को तेज़ विकास की राह पर ला खड़ा किया। जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी और नरसिंह राव के नेतृत्व में भारत में उदारीकरण शुरू हुआ, तो मैंने देखा कि एक नई पीढ़ी के लिए एक बड़ा अवसर सामने है, उस बाज़ार में, जो अब तक मुख्यतः आपूर्ति की कमी से जूझता रहा था। मैंने एक बड़ा दाँव खेला और व्यापार जगत में कदम रखा। लक्ष्य था भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग हाउस बनाना। सिर्फ तीन वर्षों में हमने यह लक्ष्य हासिल कर लिया और 1994 तक, जब मैं 32 साल का था, मैंने कंपनी को पब्लिक कर दिया। आज वही कंपनी अदाणी एंटरप्राइज़ेज़ के नाम से जानी जाती है।”
श्री अडानी ने कहा “ 1994 की इस सफलता के बावजूद मुझे यह एहसास हुआ कि मेरे पास कोई भौतिक संपत्ति नहीं है और जब देश इंफ्रास्ट्रक्चर की क्राँति की शुरुआत कर रहा हो, तो यह मेरे लिए एक ऐसा अवसर था, जिसे नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। यह फैसला मैंने उसी वक्त ले लिया था कि मेरा अगला कदम सिर्फ ट्रेडिंग तक सीमित नहीं रहेगा। अब मेरा सपना इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का था और भारत की तरक्की की कहानी में एक भागीदार बनने का भी। लेकिन, जब मैंने पहली बार पोर्ट बनाने की मंशा जताई, तो ज्यादातर लोगों को लगा कि मैं अपना होश खो बैठा हूँ। सिर्फ इसलिए नहीं कि मैंने ज़िंदगी में एक भी ईंट नहीं लगाई थी, बल्कि इसलिए भी कि मैंने पोर्ट बनाने के लिए कच्छ क्षेत्र के मुंद्रा को चुना, जो कि भारत के सबसे बड़े दलदली इलाकों में से एक था।”
उन्होने कहा “ मुझे आज भी याद है, जब मैंने यह विचार बैंकर्स के सामने रखा, तो उनमें से कुछ हँसने लगे और बोले, मिस्टर अदाणी, आप हमसे ऐसी ज़मीन की फंडिंग कैसे चाह सकते हैं, जो पानी में डूबी है?" और वे गलत नहीं थे। मुंद्रा में न कोई रास्ता था, न कोई इंडस्ट्री, न ही कोई उदाहरण। यही वह पल था, जब मेरी पहली सोच- 'सावधानी से ज्यादा विश्वास' ने काम किया। क्योंकि मेरा विश्वास सिर्फ ज़मीन के लिए फंड माँगने का नहीं था। मैं तो उन्हें एक ऐसी संभावना के लिए तैयार करना चाहता था, जिसे अब तक किसी ने सोचा भी नहीं था।”
उद्योगपति ने कहा कि नक्शे आपको वहीं तक ले जाते हैं, जहाँ पहले कोई गया हो। लेकिन, यदि कुछ नया बनाना हो, तो आपको नक्शा नहीं, बल्कि ऐसा कम्पास चाहिए, जो संभावनाओं की दिशा दिखाए। दिशाएँ केवल वहाँ तक ले जाती हैं जहाँ कदमों के निशान पहले से हों लेकिन दृष्टि वहाँ ले जाती है जहाँ अभी किसी की कल्पना भी नहीं पहुँची और मेरे विश्वास की दिशा ने मुझे मुंद्रा तक पहुँचाया। एक समय दलदल रहा यह क्षेत्र, आज भारत का सबसे बड़ा व्यावसायिक पोर्ट है। यहीं से एक नई शुरुआत हुई। मुंद्रा अब अदाणी समूह के 21 पोर्ट्स और टर्मिनल्स के नेटवर्क का केंद्र बन चुका है, जो देशभर के 17 और विदेशों के चार स्थानों में फैले हुए हैं। आज अदाणी पोर्ट्स भारत के समुद्री व्यापार का लगभग 30 प्रतिशत संचालन करता है और 40,000 एकड़ में फैले भारत के सबसे बड़े औद्योगिक विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईज़ेड) को भी ऊर्जा देता है।
उन्होने कहा “ यही आत्मविश्वास मुझे अगली बार ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड ले गया। क्वींसलैंड मेरे 'दूसरे जीवन-सिद्धांत' की सुविधा नहीं, बल्कि 'परिणाम को प्राथमिकता' का सजीव प्रतीक बना। भारत में कोयले की कमी नहीं थी, लेकिन अच्छी गुणवत्ता वाले कोयले की थी। इसलिए यह परियोजना कोयले की लालसा से नहीं, बल्कि उस परिणाम से जन्मी, जो भारत को बेहतर गुणवत्ता वाला कोयला उपलब्ध कराना था। यह परियोजना उस परिणाम की उपज थी, जिससे कार्बन उत्सर्जन घटे और भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता सुनिश्चित हो। तब शायद हम अंदाज़ा नहीं लगा पाए थे कि कार्माइकल कोल माइन इस सदी की सबसे विवादास्पद ऊर्जा परियोजनाओं में से एक बन जाएगी। और यह तो हमारी अपनी ज़मीन पर भी नहीं थी। हम ऑस्ट्रेलिया में निर्माण कर रहे थे। एक ऐसा देश, जहाँ हमारे पास न कोई राजनीतिक पहुँच थी, न कोई ऐतिहासिक मौजूदगी और न ही कोई संस्थागत सहयोग। विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा था। वैश्विक पर्यावरण समूहों ने हमारे खिलाफ जबरदस्त अभियान छेड़ दिया, कई महाद्वीपों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए।”
श्री अडानी ने कहा “ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने हमें खलनायक बना दिया। बैंकों ने दबाव में आकर वित्तपोषण से हाथ खींच लिया। बीमा कंपनियों ने हमें कवर देने से इनकार कर दिया। कार्यकर्ताओं ने रास्ते रोके, कानूनी चुनौतियाँ पेश कीं और तो और, हमारी गतिविधियों को शारीरिक रूप से रोकने की कोशिश भी की। हमें अदालतों में घसीटा गया, संसदों में बहस हुई और अखबारों की सुर्खियों में आलोचना का निशाना बनाया गया। ज़मीन पर हमारे लोग लगातार उत्पीड़न झेलते रहे। हमारी अनुमति प्रक्रिया में देरी हुई, रेलवे परियोजना पर सवाल उठे, और उस भूमि पर हमारे अस्तित्व के अधिकार को भी चुनौती दी गई। जहाँ भी देखा, एक ही संदेश था, पीछे हटो। लेकिन, हम नहीं हटे। और आज हमारा कारमाइकल प्रोजेक्ट क्लीनर कोल से ऑस्ट्रेलिया की इंडस्ट्रीज़ को ऊर्जा दे रहा है, हज़ारों लोगों को रोज़गार दे रहा है, और एक ऐसा इंडो-ऑस्ट्रेलियन कॉरिडोर बना चुका है, जो व्यापारिक ही नहीं, रणनीतिक रूप से भी अहम् है।”
उन्होने कहा कि यह हमारी राष्ट्र की ऊर्जा सुरक्षा का प्रतीक है। और यह हमारे उस चयन का प्रतीक है, जिसमें हमने सुविधा नहीं, परिणाम को प्राथमिकता दी और इसी जज़्बे के साथ मैं पहुँचा खावड़ा- मेरे तीसरे सिद्धांत अनुरूपता नहीं, सृजन का साक्षी। अगर मुंद्रा नमक से भरी दलदली ज़मीन थी, तो खावड़ा दलदली ज़मीन के नीचे नमक से भरा रेगिस्तान था। यहाँ तक कि कहा गया कि यह ऐसा रेगिस्तान है, जहाँ ऊँट भी चलने से मना कर देते हैं।
उन्होने कहा “ विकास वही सच्चा है जो मानवता की बुनियाद पर खड़ा हो, नहीं तो वह केवल विस्तार है। मेरे लिए धारावी ईंट और सीमेंट का प्रोजेक्ट नहीं है। यह सुविधा नहीं, संवेदनशीलता का प्रोजेक्ट है। यह हमारे राष्ट्र की आत्मा के सामने रखा गया एक आईना है।

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