आईआईटी कानपुर की मदद से गंगा नदी के अतीत पर शोध करेगी सरकार

लखनऊ, 20 अगस्त (वार्ता) उत्तर प्रदेश सरकार ने आईआईटी-कानपुर के नेतृत्व में एक रिसर्च शुरू करने की योजना बनाई है जिसके तहत सैटेलाइट उपग्रहों से ली गई दुर्लभ तस्वीरों की मदद से गंगा नदी के अतीत का अध्ययन किया जाएगा। अधिकारियों की मानें तो राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) द्वारा शुरू की गई यह पहल नदी की विरासत के संरक्षण और उसकी निरंतरता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह परियोजना नौ प्रमुख स्थानों - हरिद्वार, बिजनौर, नरौरा, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, भागलपुर और फरक्का के लिए इंटरैक्टिव डिजिटल डिस्प्ले भी विकसित करेगी जो स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर सूचित निर्णय लेने के लिए महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करेगी।
आईआईटी कानपुर के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रो. राजीव सिन्हा ने कहा कि इस परियोजना को जल शक्ति मंत्रालय के एनएमसीजी द्वारा शुरू किया गया था। यह परियोजना पहले ही पूरी हो चुकी है और एनएमसीजी अब इस डेटा और जानकारी को एक वेब-जीआईएस पोर्टल पर उपलब्ध कराने के लिए एक नई परियोजना को वित्त पोषित कर रहा है, ताकि यह आम जनता के लिए सुलभ हो सके।
उन्होंने बताया कि सभी डेटा को एक शक्तिशाली क्वेरी सिस्टम वाले वेब-जीआईएस प्लेटफ़ॉर्म में एकीकृत किया जाएगा जिससे शोधकर्ता आवश्यकतानुसार विशिष्ट डेटा को शीघ्रता से प्राप्त कर सकेंगे।
दरअसल उपग्रहों से ली गई तस्वीरों में प्रयागराज में संगम क्षेत्र के आसपास गंगा की आकृति विज्ञान में महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं और दिलचस्प बात यह है कि 1965-2019 की अवधि के दौरान यमुना नदी में इतने अधिक परिवर्तन नहीं हुए। यद्यपि गंगा ने अपने सामान्य स्वरूप की स्थिति को बनाए रखा है, फिर भी चैनल बेल्ट की चौड़ाई और सक्रिय बाढ़ के मैदान की चौड़ाई में उल्लेखनीय कमी आई है।
सरकार के अधिकारियों के मुताबिक वैज्ञानिकों के पास अब ठोस मानचित्र हैं जो उन क्षेत्रों को दर्शाते हैं जहां गंगा को अपनी पुरानी लय वापस पाने में मदद मिल सकती है और जहां बेहतर भूमि उपयोग से इनकी सेहत में सुधार हो सकता है।
आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक इसे गंगा संरक्षण में डेटा-आधारित निर्णय लेने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं।

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