जातीय रैलियों पर रोक के मामले में सुनवाई तीन सितंबर को
लखनऊ 04 अगस्त (वार्ता) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने जातीय रैलियों पर रोक के मामले में केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने को समय देकर अगली सुनवाई तीन सितंबर को नियत की है।पहले कोर्ट ने केंद्र सरकार को मामले में जवाब पेश करने का मौका दिया था। साथ ही कोर्ट ने याची को भी पिछले 10 साल में राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित की गई जातीय रैलियों का ब्योरा नए हलफनामे पर दाखिल करने को कहा था। शुक्रवार को मामले की सुनवाई के समय केंद्र सरकार के वकील ने मामले में जवाब दाखिल करने को और समय मांगा। इस पर समय देकर कोर्ट ने मामले को तीन सितंबर को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।
मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने यह आदेश स्थानीय वकील मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर दिया।पहले, इस मामले में कोर्ट ने पहले, पक्षकारों केंद्र व राज्य सरकार समेत केंद्रीय निर्वाचन आयोग एवं चार राजनीतिक दलों कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से जवाब मांगा था।
याचिकाकर्ता ने यह याचिका वर्ष 2013 में दायर की थी। उसका कहना था कि उत्तर प्रदेश में जातियों पर आधारित राजनीतिक रैलियों की बाढ़ आ गयी है। सियासी दल ब्राहमण रैली, क्षत्रिय रैली, वैश्य सम्मेलन आदि नाम देकर अंधाधुंध जातीय रैलियां कर रहे हैं। जिनपर रोक लगाई जानी चाहिए।
दरअसल, 11 जुलाई 2013 को कोर्ट ने को एक अहम आदेश में पूरे उत्तर प्रदेश में जातियों के आधार पर की जा रही राजनीतिक दलों की रैलियों पर तत्काल रोक लगा दी थी। साथ ही इन पक्षकारों को नोटिस जारी की थी। याची का तर्क था कि इससे सामाजिक एकता और समरसता को जहां नुकसान हो रहा है वहीं, ऐसी जातीय रैलियां तथा सम्मेलन समाज में लोगों के बीच जहर घोलने का काम कर रहे हैं, जो संविधान की मंशा के खिलाफ है।
गौरतलब है कि 2013 में होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बसपा ने प्रदेश के करीब 40 जिलों में ब्राहमण भाईचारा सम्मेलन आयोजित किये थे। उसके अलावा सपा ने भी पहले लखनऊ में ऐसा ही सम्मेलन किया था। साथ ही उसने मुस्लिम सम्मेलन भी आयोजित किये थे।

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