भारत के हर व्यक्ति की परंपरा और पहचान एक है : मोहन भागवत

नयी दिल्ली, 28 अगस्त (वार्ता) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि हमारे धर्म, संस्कृति तथा संस्कार समान हैं और यह भाव हर भारतवासी में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि रहन सहन, भाषा-बोली अलग-अलग हो सकती हैं लेकिन यह अटल सत्य है कि हम सब भारतीय हैं और हमारी परंपरा तथा पहचान एक है।

श्री भागवत ने संघ के सौ साल पूरे होने पर तीन दिवसीय व्याख्यान माला के तीसरे दिन गुरुवार को यहां विज्ञान भवन में आयोजित “100 वर्ष की संघ यात्रा, नये क्षितिज” पर बोलते हुए कहा कि हमारा बहुधर्मी देश है लेकिन हमारे संस्कार और संस्कृति एक है यह भावना हर भारतवासी में होनी चाहिए। हमारे वैदिक काल में जो शिक्षा थी उसकी प्रासंगिकता का ध्यान रखते हुए उसे लागू करना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म बदलने से कौम नहीं बदलती है और सबको यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हमारी पहचान और परंपरा एक है। उनका यह भी कहना था कि अखंड भारत अब भी है और इसे सिर्फ समझने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि वैदिक काल की भाषा संस्कृत थी और संस्कृत भारत के मूल स्रोत को जानने के लिए अनिवार्य है लेकिन देश की शिक्षा व्यवस्था में इसे अनिवार्य बनाने की बजाय इसके अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत है। जरूरत इस बात की है कि भाषा को शिक्षा में थोपा नहीं जाना चाहिए। संघ किसी धर्म या संप्रदाय का विरोधी नहीं है इसलिए हम किसी धर्म के व्यक्ति के नाम से परहेज नहीं करते हैं लेकिन आक्रांताओं के नाम पर किसी शहर या सड़क का नाम नहीं होना चाहिए।
संघ प्रमुख ने जनसंख्या असंतुलन पर चिंता जताई और कहा कि घुसपैठ रोकने के लिए हर स्तर पर प्रयास होने चाहिए। उन्होंने जनसंख्या असंतुलन को चिंता का विषय बताया लेकिन कहा कि इसे दूर करने के उपाय होने चाहिए। तीन बच्चों होने की बात को सही बताते हुए उन्होंने कहा कि तीन से ज्यादा बच्चे नहीं होने चाहिए।
संघ प्रमुख ने कहा कि संघ को लेकर लोगों की अवधारणा धीरे धीरे बदल रही है। उन्होंने जयप्रकाश नारायण का उदाहरण दिया और कहा कि जो पहले संघ के एकदम खिलाफ थे उन्होंने आपातकाल में कहा कि संघ ही देश को बचा सकता है। यही बदलाव है और संघ के प्रति यह बदलाव धीरे धीरे आ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि संघ का स्वयं सेवक अत्याचार नहीं करता है।
श्री भागवत ने हिंदू शब्द पर कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र है, यह एक सत्य है। उन्होंने कहा, “हम शब्दों के झगड़े में नहीं पड़ते। हिंदू एक भाव, विचार है। भारत में मुस्लिम, हिंदू सभी एक हैं। दोनों पूजा पद्धतियों को लेकर भय भर दिया गया है। हिंदुओं में देश टूटने का भय घर कर गया और मुसलमानों से कहा जाता है कि हिंदुुओं से मिलेंगे, तो सब कुछ गवां देंगे।”
उन्होंने कहा,“ पूजा पद्धति खान-पान की विविधता से लोग अलग- अलग समाज के नहीं हो जाते, हमें यह समझना है। हमें समझना होगा कि हम एक ही समाज के हैं। ‘वी आर वन पीपुल’ हमारे अंदर यह विश्वास जगना चाहिए।”
घुसपैठ के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि इसे मुसलमानों का सवाल नहीं बनाया जाना चाहिए। राज्य एक व्यवस्था है। अगर कोई आता है तो वह अनुमति लेकर क्यों नहीं आता। भारत में भी मुसलमान रहते हैं और अगर मुसलमान को ही रोजगार देना है तो अपने यहां के मुसलमान को ही रोजगार क्यों न दें। उन्होंने कहा कि आबादी के स्वरूप का परिवर्तन एक समस्या जरूर है, इससे धर्मान्तरण का मुद्दा उठता है। उनका कहना था कि मुस्लिम और कैथलिक धर्म गुरुओं ने उनसे बातचीत में कहा कि उनके यहां धर्मान्तरण को सही नहीं माना जाता है।
अखंड भारत के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इसे घोषित करने की जरूरत नहीं है। यह सत्य है और समय के साथ यह सत्य एक दिन उजागर होगा।
उन्होंने कहा कि अखंड भारत की अवधारणा आज भी है और उसे समझने की जरूरत है। उन्होंने विभाजन के दुष्परिणाम आज भी सामने हैं और मौलाना आजाद ने 1946 में चट्टान अखबार के साथ एक इंटरव्यू में इसके दुष्परिणों की कल्पना की थी। पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में आज जो स्थिति है, वह इसीलिए है कि उन्हें अपनी जड़ों से दूर रखने की कोशिश की जा रही है। किसी हाथ को यदि लम्बे समय तक बांधकर रखेंगे तो वह सुन्न् पड़ जाता है और यही स्थिति पाकिस्तान की आज है।
श्री भागवत ने कहा कि संघ ने भारत विभाजन का विरोध किया था, लेकिन उस समय संघ की ताकत ही क्या थी। महात्मा गांधी ने तो यहां तक भी कहा था कि विभाजन उनकी लाश पर होगा, पर उसके बावजूद विभाजन रोका नहीं जा सका।
संघ भाजपा के अलावा दूसरे दलों का साथ क्यों नहीं देने संबंधी सवाल पर संघ प्रमुख श्री भागवत ने कहा, “अच्छे काम के लिए जो सहायता मांगता है, हम उसकी मदद करते हैं। सहायता मांगने वालों को सहायता मिलती है, पर जो लोग हमारी सहायता लेने से दूर भागते हैं, तो उन्हें सहायता नहीं मिल पाती, ऐसे में हम क्या करें।”
उन्होंने संघ को लेकर लोगों की सोच में आ रहे बदलाव पर कहा कि जयप्रकाश नारायण ने 1948 में संघ का घोर विरोध किया था, लेकिन आपातकाल के दौरान उन्होंने संघ से कहा कि देश को आप ही ही बचा सकते हैं। संघ के प्रति लोगों के नजरिए में आ रहे बदलाव का यह एक उदाहरण है।
श्री भागवत ने जनसंख्या की वृद्धि दर को तीन प्रतिशत जरूरी बताया और कहा कि जनसंख्या में तीन प्रतिशत से कम वृद्धि होने पर राष्ट्र लुप्त हो जाते हैं। एक परिवार में तीन बच्चे होने चाहिए। यह देश, माता पिता, परिवार, बच्चों तथा सामाजिक स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा है। इससे जनसंख्या पर्याप्त रहेगी, इससे अधिक बच्चे होना भी ठीक नहीं है। उन्होंने समाज में एक वर्ग में बच्चों के अधिक होने की धारणा की ओर संकेत करते हुए कहा कि एक तरफ आप कम बच्चे पैदा कर रहे हैं, इसलिए उधर ज्यादा दिख रहा है, जबकि वहां भी कमी आ रही है, यह प्रकृति का नियम है। उन्होंने कहा कि नयी पीढ़ी को तीन बच्चों के लिए तैयार रहना चाहिए।
शहरों और मार्गों के नाम बदले जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण यह है कि नाम क्या रखे जायें। उनका कहना था कि किसी के नाम पर दिक्कत नहीं है, लेकिन आक्रांताओं के नाम पर नाम नहीं होने चाहिए। वीर अब्दुल हमीद, डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर ये नाम होने चाहिए।
उन्होंने देश की आधुनिक शिक्षा पद्धति को गुरुकुल प्रणाली से जोड़ने की जरूरत बताया और कहा कि फिनलैंड में गुरुकल से मिलती-जुलती शिक्षा व्यवस्था है। वह दुनियाभर से लाेग आते हैं और आठवीं तक बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दी जाती है और प्रत्येक 10 बच्चे पर एक शिक्षक होता। भारतीय संस्कृति और तकनीकी शिक्षा तथा आधुनिकीकरण के बीच टकराव के बारे में उन्होंने कहा कि तकनीकी और आधुनिकता का शिक्षा से विरोध नहीं है। जैसे जैसे मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है, नयी तकनीक आती है, उसको आने से कोई रोक नहीं सकता। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण यह है कि तकनीक का मालिक मनुष्य बनें रहे। मनुष्य का मालिक तकनीक न बन जाये, इसलिए शिक्षा आवश्यक है। भारत में शिक्षा को मनुष्य के आंतरिक ज्ञान के प्रकटीकरण का माध्यम माना जाता है।
श्री भागवत ने कहा, “हमें अंग्रेजी से कोई विरोध नहीं है। बच्चों को भारतीय संस्कृति और परंपराओं की शिक्षा दी जानी चाहिए, नैतिक ज्ञान पढ़ाया जाना चाहिए। मिशनरी स्कूलों और मदरसों में भी हमारे धर्मग्रंथों की कहानियां पढ़ाई जानी चाहिए। यह कोई सांप्रदायिकता का सवाल नहीं बल्कि संस्कृति की बात है। उन्होंने बच्चों को मिडिल कक्षाओं में संविधान की प्रस्तावना और कर्तव्यों के बारे में बढाया जाना चाहिए।”

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सपा अध्यक्ष को लगता है कि मुसलमान उनकी जेब में हैं: मायावती

हार-जीत से बड़ा है सक्षम बनना

24 जुलाई 2026 को चंद्रमा दिखाई देगा अन्टारेस (ज्येष्ठा नक्षत्र के योगतारा) के पास