बिहार विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा पर दबाव बनाने में जुटे ओम प्रकाश राजभर
लखनऊ, 3 अगस्त (वार्ता) उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने अब नए समीकरण के तहत भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। इसके संकेत उस समय मिलने शुरू हो गए जब उन्होंने कहा कि बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के साथ गठबंधन नहीं हुआ तो सारे विकल्प खुले हुए हैं।दरअसल, भाजपा की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने बिहार चुनाव लड़ने के लिए गैर-भाजपा दलों के साथ तीसरा मोर्चा बनाने के संकेत देकर अपनी राजनीतिक ताकत फिर से दिखानी शुरू कर दी है।
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने अपने बयान में कहा “ अगर बिहार में भाजपा के साथ हमारा गठबंधन नहीं होता है, तो हम सभी विकल्प खुले रखेंगे।”
योगी सरकार में मंत्री राजभर ने कहा कि उनकी पार्टी प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी और मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) सहित कई छोटी पार्टियों के साथ बातचीत कर रही है।
श्री राजभर ने कहा कि उनकी पार्टी बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से कम से कम 156 पर चुनाव लड़ने की योजना बना रही है। उन्होंने कहा “ यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि स्थिति क्या और कैसी बनती है। हम बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं, जहां हम पिछले कई वर्षों से सक्रिय हैं।”
भाजपा के सूत्रों ने बताया कि राजभर सीवान, चंपारण, सारण, गोपालगंज और बक्सर के कुछ इलाकों में सम्मानजनक सीटों के लिए भाजपा से कड़ी मोलभाव कर रहे हैं जहां राजभर, राजवंशी, राजधोबी और भर समुदायों की अच्छी-खासी मौजूदगी है। पार्टी का लक्ष्य पटवा और मंडल जैसी जातियों को भी एकजुट करना है।
अति पिछड़ी जातियां (ईबीसी) बिहार में एक महत्वपूर्ण मतदाता समूह हैं। एक अनुमान के अनुसार यह कुल मतदाताओं का 30 प्रतिशत से अधिक है।
सूत्रों ने बताया कि राजभर ने बिहार में कुछ चुनावी जगह बनाने के लिए गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ बैठकें की हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एसबीएसपी की मुख्य कार्रवाई को गठबंधन राजनीति, चुनावी सौदेबाजी और क्षेत्रीय जातिगत गतिशीलता के चश्मे से देखा जा सकता है। राजभर का राजनीतिक प्रभाव मुख्यतः पूर्वी उत्तर प्रदेश में ओबीसी और दलित लामबंदी में निहित है। बिहार में उनके विस्तार को सीमा पार इसी मॉडल को दोहराने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
सूत्रों ने कहा कि एसबीएसपी का उद्देश्य गैर-प्रभावी ओबीसी समूहों को एकजुट करना है, खासकर उन समूहों को जो राजद या जद(यू) जैसे बड़े दलों द्वारा कम प्रतिनिधित्व महसूस करते हैं।

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