संघ पड़ोसी देशों में शुरू करेगा संपर्क अभियान:भागवत
नयी दिल्ली, 27 अगस्त (वार्ता) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश में हर घर, हर वर्ग, हर सम्प्रदाय के साथ सम्पर्क करने का एक बड़ा अभियान शीघ्र चलायेगा और वह इसके साथ पड़ोसी देशों में भी सम्पर्क कार्यक्रम चलाने का विचार कर रहा है।
संघ की योजना इस अभियान को विश्वस्तर पर ले जाने की है।संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत ने संगठन के शताब्दी वर्ष समारोहों के अंतर्गत राजधानी में - ‘100 वर्ष की संघ यात्रा , नये क्षितिज’ शीर्षक से तीन दिवसीय व्याख्यान माला में बुधवार को अपने दूसरे व्याखान में संगठन की आगे की यात्रा का खाका प्रस्तुत करते हुए ये बातें कहीं। पहले दिन उन्होंने संघ की स्थापना और सौ साल की यात्रा का एक विहंगम खाका प्रस्तुत किया था और कहा था कि संघ को जितना विरोध झेलना पड़ा उतना विरोध किसी अन्य सामाजिक संगठन को नहीं में सहना पड़ा है।उन्होंने कहा ,“अब संघ का विरोध कम हो गयी है, विरोध का धार भोथरी हो गयी है । संघ की बात को आज सुना जाता है।”
उन्होंने कहा कि हमें सर्वत्र संपर्क बढ़ाना होगा, सबसे पहले पड़ोसी देशों पर ध्यान देना है। हमरी, नदियां, जगल, पहाड़ वही हैं केवल कागज पर विभाजन की रेखा है। हमरा लक्ष्य उनको जोड़ना, वहां शांति और विकास की कामना करना होना चाहिए। उनके भले ही पंथ संप्रदाय अलग भले हों, उनके उनके संस्कार अच्छे होने चाहिए।
उन्होंने कहा , “इसके लिए हमें व्यक्त से व्यक्ति का सम्पर्क और हृदय से हृदय की बात’ स्थापित किये जाने पर बल दिया। उन्होंने इस विषय में कहा यह भी स्वयं सेवकों के मन में चल रहा है। इससे विश्व का बड़ा भला होगा। पर इस सोच को मूर्तरूप देने की शुरुआत घर से होनी चाहिए।”
उन्होंने कहा कि संघ विदेश के लोगों से सम्पर्क करता है, और संगठन के संपर्क में आने वालों को लगता है कि उनके देश में भी संघ जैसा संगठन होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वैसे तो संगठन के सामने अगले 100 साल के लिए क्या रखना है, यह प्रतिनिधि सभा तय करेगी। पर उनकी सोच है कि हमें एक-एक गांवा, एक एक गली और एक एक घर तक पहुंचना है, जिसमें गरीब-अमीर और हर वर्ग और संपदाय के लोग शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि संघ में लोग चाहते हैं कि संगठन हर वर्ग में अच्छा काम कर रहे अन्य संगठनों के साथ भी संपर्क बढ़ा कर एक नेटवर्क शीघ्रता से खड़ा किया जाना चाहिए। “ इस तरह सबके प्रयास पूरक होंगे ओर लोग समाज परिवर्तन के काम में मिल कर लग जायेंगे।”
उन्होंने कहा कि समाज में अविश्ववास और दुर्भावना हो तो मिल जुल कर कोई बड़ा काम नहीं हो सकता है। अविश्वास दूर करना । हमारे समाज के दूसरे वर्ग के लोगों से इस तरह सम्पर्क करना है, ताकि उन्हें विश्वास हो कि हमारी विविधताओं के बावजूद हम एक ही समाज के अंग हैं और हमारे विकास में समाज का भी विकास जुड़ा है।
संघ प्रमुख ने कहा, “ दुर्बल वर्ग के लिए मदद का हाथ बढ़ाना हमारी सहज प्रक्रिया होनी चाहिए। अविश्वास से निराशा होती है।”
उन्होंने कहा कि बाहर से आयी विचारधारायें आक्रमण के साथ आयी थीं , पर उन्हें जिन्होंने स्वीकार किया वे यहीं के हैं। भारतीय समाज की सोच किसी से दुराव नहीं रखने की है। उन्होंने रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं अपने अनुभव, अनुशीलन से सिद्ध किया कि इस्लाम भी सत्य की सिद्धि की ही एक राह है ।
उन्होंने, उपभोग , विकेंद्रित उत्पादन , ऊर्जा की बचत ,पर्यावरण संरक्षण , आदि के क्षेत्र में राष्ट्रीय प्रतिमान स्थापित करने और उसको विश्व के सामने रखे जाने पर बल दिया।
स्वदेशी पर बल देते हुए कहा कि जो चीज अपने गांव या देश में उपलब्ध हो उसे विदेश से क्यों मनाना। स्वदेशी से अपने पास के लोगों को रोजगार मिलेगा। उन्होंने कहा कि सामाजिक विषमता मन में पैदा होती है, इसे मन से हटाने के लिए हमें अपने आस पास हर प्रकार के लोगों से मित्रता और पारिवारिक संबंध विकसित करना चाहिए। मंदिर, पानी ,श्मशान के मामले में किसी के साथ भेद नहीं होना चाहिए, स्वयं सेवकों को यह करना है।
आत्म निर्भता को उन्होंने विकास की कुंजी बताया लेकिन कहा कि इसका मतलब अपने को दूसरे से अलग करना नहीं है। दुनिया परस्तर निर्भर हो पर उसमें किसी पर कोई दबाव न हो। इसी संदर्भ में उन्होंने कहाक विदेश नीति में बाहर का दबाव नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमारे मनीषियों ने सृष्टि में विविधता के बीच एकता का दर्शन कियेऔर सबके सुख व कल्याण का आह्वान किया। संघ प्रमुख ने कहा, “ इसी भाव के साथ हिंदू राष्ट्र के विकास का मिशन ही संघ है क्योंकि हिंदू राष्ट्र का ध्येय विश्व कल्यण है । हमें हमारे पूर्वजों ने सिखाया है कि प्रचीन देश होने के लोग बड़े भाई की तरह भारत के लोग ऐसा आदर्श जीवन जीयें जिससे दुनिया से आने वाले हमसे जीवन का तरीका सीखें ।” उन्होंने कहा कि दुनिया को अपने दृष्टिकोण को 180 अंश मोड़ना होगा। रास्ता धर्म ही है जिसमें विविधता की स्वीकार्यता हो, जिसमें सबकी सत्ता की मर्यादा रखते हुए संतुलित ढंग से जीवन जीना हो। अपने जीवन को धार्मिक बना कर अपने को दुनिया के लिए देना, यही कर्तव्य है।
राजा शिवि, कबूतर और बाज की कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि अपने अपने धर्म का विचार कर उसके अनुसार आचरण से सबका भला होता है।
उन्होंने जड़वाद, व्यक्तिवाद आज अति पर पहुंच गया है। अपने उपभोग को प्रमुखता देने से दुनिया में विषमता बढ़ती है। बिना मर्यादा के विकास से पर्यावरण का विनाश हो रहा है। पर्यावरण का संरक्षण अपनी आवश्यकताओं पर संयम के बिना समय नहीं। कट्टरता बढ रही है, अपने मत के आगे किसी को न समझना एक संकट बन गया है।
संघ प्रमुख ने कहा कि हर देश का अपना आरएसएस होना चाहिए। वे अपनी प्रकृति के अनुसार अपना ऐसा संगठन ऐसी शाखाएं बने। उन्होंने बताया कि विदेशों से कुछ लोग आये थे नागपुर में उन्होंने वहां देख कर कहा कि हमारा भी एक आरएसएस हो तो अच्छा होगा । उन्होंने कहा कि भारत घर्मनिष्ठ होने के कारण ही अपने नुकसान की अनदेखी करते हुए संयम बरतता है। अहित करने वालों की भी जरूरत पड़ने पर मदद करता रहा है।
उन्होंने कहा कि देश दुनिया में हर वर्ग हर व्यक्ति के साथ संघ का यह विचार पहले से था, लेकिन में आज यहां बोल रहा हूं। यह पहले बोला जाता तो काई सुनता नहीं । पर आज भारत की ही तरह संघ की स्थिति और साख है। लोग हमें सुनते हैं भले हमारा अनुपालन न करता हो। इस लिए संघ के कार्यकताओ में यह चर्चा है कि “आगे का 100 साल का लक्ष्य हो कि हम जो संघ में कर रहे हैं व पूरे समाज में हो। उत्तम चारीत्रिक निर्माण के साथ जीने वाले लोग पूरे समाज में विद्यमान हैं।”
उन्होंने कहा कि भारत में जिनता बुरा दिखया जाता है, उससे 40 गुना अच्छा भारतीय समाज में है। केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर इस राष्ट्र का मूल्यांकन करना सही नहीं होगा। भारत का बल बिखरा है जरूर है, पर सक्रिय है उसको जोड़ना है।
धर्माचरण के बिना यह संभव नहीं है। घर्म दृष्टि को जानना आवश्यक है। हमारे भारतीयों के लिए घर्म कोई खोज नहीं बल्कि गुरुत्वाकर्षण की तरह से प्रारंभ से है। इसका मान लिया जाए तो बात आसान होगी। प्रकृति के संचलन का नियम घर्म है। हिंदू घर्म सार्वभौमिक है। घर्म एक सत्य तत्व है, जिसके आधार पर सब चलता है। इसे स्वभाव कहते हैं । प्राकृतिक गति को समझ कर उसका आचरण करने पर किसी के घर्मांतरण की आवश्कता ही नहीं है।
संघ प्रमुख ने अपने घर के अंदर स्वभाषा , स्व भूषा, भजन ,भोजन की जीवन शैली को अपनाने पर बल दिया और कहा कि भ्रमण और भवन भी अपनी परंपरा के अनुकूल होने चाहिए। उन्होंने कहा, “ पेरिस जाओपर कुंभलगढृ और पड़ोस की झुग्गी में भी बच्चों और परिवार को ले जाओ।’ उन्होंने कहा कि , ‘हर हालत में संविधान और कानून का पालन किया जाना चाहिए। हां प्राण पर आती है तो आत्मरक्षा का अधिकार सबको है। पर कानून हाथ में लेकर बात नहीं होनी चाहिए। विघटनकारी इसका लाभ उठाते हैं। बिल समय से भरना, लाइसेंस का समय से नवीनीकरण भी आज देश के लिए जीने का एक उदाहरण है।”
उन्होंने उपस्थित लोगों का आह्वान किया, “आप जो भी संघ के बारे में सोचें, आप की सोच तथ्यों पर अधारित होना चाहिए। संघ के पास आइए, विश्व धर्म विकसित करने के उसके काम को देखिये।”

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