मृतक आश्रित न होने पर भी कानूनी वारिस वाहन दुर्घटना के मुआवजे का हकदार : उच्च न्यायालय
लखनऊ 08 अगस्त (वार्ता) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में कहा कि मृतक आश्रित न होने पर भी मृतक का कानूनी वारिस वाहन दुर्घटना के मुआवजे का हकदार है।
वाहन दुर्घटना में मृतक के कानूनी वारिस को मोटर वाहन कानून के तहत मिलने वाले मुआवजे से महज इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि वह मृतक पर आश्रित नहीं था।न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की एकल पीठ ने यह टिप्पणी मोटर वाहन दुर्घटना के मुआवजे के मामले में राज्य की ओर से दाखिल दो अपीलों को खारिज करके फैसले में की। अपीलों में मोटर वाहन दुर्घटना दावा अधिकरण के निर्णय(अवार्ड) को चुनौती दी गई थी। इस मामले में कोर्ट के समक्ष मुद्दा था कि क्या मोटर वाहन कानून के तहत निर्धारित सीमा से बाहर मृतक की विवाहित पुत्री को मुआवजे का दावा करने से बाहर किया जा सकता है।
इस मामले में दावेदार विवाहित पुत्री तबस्सुम ने मोटर वाहन दुर्घटना दावा अधिकरण के समक्ष यह कहकर मुआवजा पाने का दावा किया कि वर्ष 2009 में काकोरी थानाक्षेत्र में मोहान रोड पर उसके पिता आफताब हुसैन और भाई तनवीर हुसैन मोटरसाइकिल से जा रहे थे। सामने से आ रहे ट्रक से दुर्घटना होने पर दोनों की मृत्यु हो गई थी। इस दावे पर अधिकरण ने दो लाख 13 हजार 200 रुपए और एक लाख 16 हजार 400 रुपये छह प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ मुआवजा अदा करने का निर्णय दिया था।
इस निर्णय के खिलाफ राज्य की ओर से सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता व अन्य ने दो अपीलें दाखिल कर अधिकरण के निर्णय को रद्द करने का आग्रह किया। अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि, चूंकि, दावेदार, एक मृतक की विवाहित पुत्री है, लिहाजा उसको अपने पिता पर आश्रित नहीं कहा जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि दावेदार पुत्री अपने पिता और भाई के साथ रहती थी। ऐसे में महज दावेदार पुत्री के विवाहित होने पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह आश्रित नहीं होगी। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने अधिकरण के निर्णय को सही करार देकर दोनो अपीलें खारिज कर दीं।

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