आर्थिक बदहाली का शिकार हैं रेलवे की पहचान ‘कुली’

कानपुर 21 सितंबर (वार्ता) दशकों तक रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म की जरुरत और पहचान समझे जाने वाले ‘कुलियों’ की हालत आधुनिक परिवेश में पतली होती जा रही है। पिछले 20 सालों में रेलगाड़ियों की संख्या बढ़ने के साथ रेल यात्रियों की तादाद भी लगभग दो गुनी हो गयी मगर पीढ़ी दर पीढ़ी यात्रियों के सामान की ढुलाई करने वाले कुलियों की आय में इस दौरान साल दर साल गिरावट ही आती गयी, नतीजन उनके परिवार आर्थिक बदहाली का शिकार हाेकर रह गये हैं।

कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर हर रोज सैकड़ों ट्रेनों की आवाजाही होती है। दस प्लेटफार्म वाले इस स्टेशन पर यात्री बोझ को देखते हुये यहां से कई रेलगाड़ियों को गोविंदपुरी,अनवरगंज और पनकीधाम रेलवे स्टेशनों पर शिफ्ट किया गया है। एक अनुमान के मुताबिक पिछले दो दशकों में कानपुर सेंट्रल पर यात्री बोझ में करीब 40 फीसदी का इजाफा हुआ है जबकि यात्रियों की सेवा में कार्यरत कुलियों की संख्या वर्ष 2008 की तुलना में लगभग 35 फीसदी कम हुयी है और कुलियों की आय में 70 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गयी है।
इसका कारण ट्राली बैग और विकलांग और बुजुर्ग यात्रियों की सुविधा के लिये लगायी गये इलेक्ट्रिक वाहन है जिन पर माल ढुलाई का क्रम जारी है। कानपुर सेंट्रल पर इस समय 247 कुली दिन रात यात्रियों की बॉट जोहते हैं। लाल वर्दी और पीला बिल्ला लगाये कुली ट्रेन के प्लेटफार्म को छूने के साथ ही स्लीपर और विशेषकर एसी कोच के आगे सामान ढोने की आस में खड़े हो जाते हैं मगर अधिकतर मौकों में उन्हे निराशा हाथ लगती है जब यात्री अपना ट्राली बैग खुद ही चलाते हुये निकल जाते है वहीं ज्यादा सामान वाले यात्रियों के लिये कार्ट मौजूद रहती है जिनका काम वैसे तो विकलांग और बुजुर्ग यात्रियों को सेवा प्रदान करना होता है मगर स्टेशन प्रशासन की मिलीभगत से इन कार्टो का उपयोग माल ढुलाई पर हो रहा है।
स्टेशन पर मौजूद कुली विजय सिंह और शेर सिंह ने बुझे मन से ‘यूनीवार्ता’ से बातचीत में अपना दर्द बयां किया। विजय ने कहा “ उनके परिवार में पत्नी माता पिता और दो छोटे बच्चे हैं जिनकी देखभाल करनी मुश्किल होती जा रही है। वर्ष 2000 जब पिता का बिल्ला उनको मिला था तो हर रोज की कमाई 400-500 रुपये हो जाती थी और 25 वर्ष बाद यह आय घट कर प्रतिदिन 100-150 रुपये रह गयी है। कई बार ऐसा भी होता है जब उन्हे एक भी यात्री सेवा का मौका नहीं देता।
शेर सिंह ने कहा कि वर्ष 2008 में कानपुर सेंट्रल में 402 कुली थे जिनमें 225 कुलियों को रेलवे ने गैंगमैन की नौकरी दे दी थी मगर उसके बाद से स्टेशन पर पौने दो सौ के आसपास कुली रह गये थे। बाद में कुछ नये कुली आये और अब यहां कुलियों की संख्या 247 है मगर इनमें से कई कुली प्लेटफार्म पर आते भी नहीं है क्योंकि यहां सारा दिन ट्रेन के साथ साथ प्लेटफार्म पर दौड़ लगाना और निराश होना आम बात हो गयी है।
विजय ने कहा “ रेलवे को कुलियों की जीविका के बारे में विचार करना चाहिये, आखिर हम दशकों से रेलवे के विशाल परिवार का अहम हिस्सा हैं और पूरी मेहनत और लगन के साथ यात्रियों की सेवा करने में तत्पर रहे हैं। रेलवे को यदि हमें समायोजित करने में परेशानी है तो कम से कम वह हमारा न्यूनतम मानदेय तो निर्धारित कर दे ताकि हमारा परिवार भी सम्मानजनक तरीके से जीवन यापन कर सके।”
माथे पर अगिनत पसीने की बूंदे लिये भरभरायी आवाज में विजय और शेर सिंह ने कहा “ अब हम अपने बच्चों को कुली के पेशे में लाने की गलती नहीं करेंगे। उन्हे पढ़ा लिखा कर किसी और रोजगार में लगायेंगे। हम पाई पाई को मोहताज हैं। कर्ज में डूबे हुये है और आये दिन अपमानित होना पड़ता है। बाप दादाओं के इस पेशे में आने से पहले हमने सोचा नहीं था कि उन्हे आज यह दिन देखना पड़ेगा। रेलवे प्रशासन को हमारी आर्थिक हालत पर विचार करना चाहिये।”

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