महंत दिग्विजयनाथ एवं अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर सप्तदिवसीय संगोष्ठी

गोरखपुर 07 सितंबर (वार्ता) ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 56 वीं एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 11वीं पुण्यतिथि के अवसर पर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में आयोजित सप्तदिवसीय संगोष्ठी के तीसरे दिन रविवार को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 विकसित भारत की आधारशिला विषय पर मुख्य वक्ता भगतफूल सिंह महिला विश्वविद्यालय सोनीपत हरियाणा की पूर्व कुलपति प्रो सुषमा यादव ने कहा कि यह शिक्षा नीति शिक्षा और दीक्षा के अंतर को कम करने वाली नीति है।


प्रो. यादव ने सगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा कि इस नीति में शिक्षा और दीक्षा दोनों की प्रक्रिया को विकसित करने का प्रयास किया गया है।शिक्षित व्यक्ति को कभी भय नहीं होता क्योंकि वह जहां जाएगा अपनी शिक्षा से सुख प्राप्त करेगा। यह नीति सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त शिक्षा देने की नीति है।
शिक्षा का उद्देश्य हर व्यक्ति में दिव्य ज्योति जलाना व विलक्षणता को प्रकट करना है।इस नीति में स्कूलशिक्षा के बाद महाविद्यालयी शिक्षा और उसके बाद विश्वविद्यालयी शिक्षा में परिवर्तन करने पर विचार हुआ है। हर नागरिक के लिए अच्छा जीवन स्तर के साथ देश की अर्थ व्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया गया है।भारत विकसित बनना चाहता है मगर पर्यावरण के संतुलन के साथ। यह भारत की ही संस्कृति है कि पर्यावरण का उपयोग त्याग की भावना से किया जाता है। समाज का हर वर्ग, समाज से समान रूप से जुड़ा महसूस करे ऐसी शिक्षा की बात इस शिक्षा नीति में की गई है।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए विशिष्ट वक्ता दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालयए प्राणी विज्ञान के पूर्व अध्यक्ष प्रो डी के सिंह ने कहा कि तेजी से बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति है। छात्रों को डिजिटल शिक्षा के साथ.साथ भारतीय भाषाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा की शिक्षा इस नीति का केंद्र बिन्दु है। यह नीति भारत की आत्मा की पुकार है। इसके पीछे हमारे गुरुकुल शिक्षा परंपरा का विस्तार है। इसमें गुरुकुल परंपरा के पांच कोशों के विकास की बात कही गई है।
उन्होंने कहा कि हमारी पौराणिक शिक्षा नीति में भौतिक विकास के साथ आध्यात्मिक विकास पर बल दिया जाता था इसी के अनुरूप इस शिक्षा नीति को भी तैयार किया गया है। इस नीति में पर्यावरण को सुरक्षित रखने पर भी बल दिया गया है। पर्यावरण आधारित शिक्षा को देने के साथ साथ कृषि क्षेत्र में भी अधिक शोध पर विशेष बल दिया गया है।
अयोध्याधाम से आये स्वामी बालभरत दास ने कहा कि इस शिक्षा नीति में हमारी उस प्राचीन भारतीय शिक्षा को अपनाया गया है जहां शस्त्र और शास्त्र दोनों की समान शिक्षा दी जाती है। यह नीति केवल पेट भरने की ही नहीं अपितु मानव को पूर्ण मानव बनाने के नीति है।
कामदगिरि पीठ, चित्रकूट धाम से आये महंत भूषणदास ने कहा कि मानव जीवन में शिक्षा का बहुत महत्व है। हमारे मनीषियों ने उस विद्या की बात की जो मुक्ति प्रदान करेए ऐसी शिक्षा नीति जो नियुक्ति तथा विमुक्ति दोनों को दिलाने का सामर्थ्य रखती हो। नई शिक्षा नीति भी इस तरह का कार्य कर रही है। अनादि काल से विश्व भारत को देखते आ रहा है। यह हमारी संस्कृति और शिक्षा नीति के कारण से ही सम्भव हो सका।
विषय प्रवर्तन करते हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली संस्कृत विभाग के प्रो संतोष शुक्ल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 है जो पूर्ण रूप से भारतीय विरासत पर आधारित है। इस नीति का पहला लक्ष्य समावेशी शिक्षा पर जोर देना है । इस नीति का दूसरा लक्ष्य भारतीयों को आत्म निर्भर बनाना है तथा तीसरा लक्ष्य प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक का माध्यम भारतीय भाषा को बनाना है। यह नीति बहुविषयी पाठ्यक्रम तथा बहुविषयी संस्थानों के निर्माण की बात करती है। भारत को स्वस्थ, समृद्ध व विकसित बनाने के लिए इसमें छात्रों के सर्वांगीण विकास पर बल दिया गया है।
कार्यक्रम में काशी से आये जगद्गुरु श्री विष्णुस्वामी संप्रदायाचार्य श्री संतोषाचार्य .सतुआ बाबा, महंत रामलखन दास , महंत राममिलन दास, बड़ौदा से महंत गंगादास, सच्चाबाबा आश्रम अरैल से आचार्य शिवप्रकाश, देवीपाटन महंत मिथिलेशनाथ प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

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