बादल फटने की घटनाओं के पीछे मानवीय अतिक्रमण भी जिम्मेदार : प्रो ध्रुवसेन
लखनऊ 16 सितंबर (वार्ता) देहरादून के सहस्त्रधारा में सोमवार देर रात बादल फटने के चलते आई तबाही के लिये प्रकृति के साथ मानवीय अतिक्रमण को जिम्मेदार ठहराते हुये लखनऊ विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग के प्रसिद्ध भूगर्भ शास्त्री प्रो ध्रुवसेन सिंह ने कहा कि पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या दबाव के कारण मानव ने आपदा ग्रस्त क्षेत्रों में भी निवास करना प्रारंभ कर दिया है। जिसके चलते धनहानि के साथ ही जनहानि भी देखने को मिल रही है।
दो बार उत्तरी ध्रुव का दौरा कर चुके प्रो सिंह ने बताया कि इस वर्ष मानसून अल नीनो और लानीना से प्रभावित न होने के कारण सामान्य या सामान्य से कुछ ज्यादा रहा। परिणाम स्वरूप सामान्य या सामान्य से ज्यादा बारिश देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों एवं दशकों में जनसंख्या के लगातार जमीन पर बढ़ रहे दबाव के कारण मानव ने आपदा ग्रस्त क्षेत्रों में भी निवास करना प्रारंभ कर दिया है। उन्होने कहा " भारत में पूरे विश्व का करीब ढाई प्रतिशत भूभाग है, जिस पर दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी निवास करती है। लोगों को यह पता है कि यह आपदा ग्रस्त क्षेत्र है, तब भी वह रहने के लिए विवश हैं।"उन्होंने कहा कि गंगोत्री एवं केदारनाथ पर विधिवत अध्ययन करने के उपरांत एवं 2013 में केदारनाथ की आई हुई आपदा के बाद हुए अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अगर नदी में पानी बहने के लिए स्थान बचा हुआ है, तो वह नदी विकराल रूप नहीं ले सकती है। उन्होंने कहा कि लैंडस्लाइड के कारण भी नदी की धारा बहुत सी जगहों पर बदल जाती हैं। जिसके परिणाम स्वरूप इन स्थानों पर अल्पकालिक झीलें बन जाती है। धीरे धीरे इन झीलों में पानी का दबाव बढ़ता जाता है और एक समय बाद वह फट जाती है। जिसके परिणामस्वरूप वह भी आपदा का कारण बनती है। बहुत से हिमनदों के पास स्थित झीलों में भी पानी भर जाता है और वह झील भी पानी की दबाव के कारण फट जाती है।
प्रो ध्रुवसेन सिंह ने कहा कि बादल फटने का तातपर्य सीमित स्थान पर कम समय मे अत्यधिक वर्षा से है। बादल फटने के चलते भारी बारिश के पानी को पहाड़ से सीधे नीचे आना चाहिए, पर वह पानी पहाड़ से चलता है तो रास्ते मे अनियोजित विकास के चलते आने वाले सभी चीजों को तहस-नहस कर देता है। इसमें सबसे बड़ा योगदान गोल्फ (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड ) और एलएलओ (लैंडस्लाइड लेक आउट) का होता है। बादल फटने के दौरान बारिश के चलते हिमनदों और लैंडस्लाइड के चलते बनी झीलों में पानी का जब अत्यधिक दबाव बनता है तो यह फट जाती हैं और तबाही का कारण बनती हैं।
उन्होंने कहा कि बादल मुख्य रूप से तब फटते हैं जब बहुत ज़्यादा नमी से भरा बादल पहाड़ों जैसे किसी अवरोध से टकराकर अचानक ठंडी हवा के संपर्क में आती है। जिससे उसमें मौजूद पानी की बूंदें एक साथ होकर भारी घनत्व का बादल बना लेती हैं, और यह बादल एक ही सीमित दायरे में तेज़ी से पानी गिराता है। उन्होंने कहा कि यह घटना जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों से बढ़ रही है, क्योंकि गर्म हवा में ज़्यादा नमी समा सकती है, जिससे बादल फटने की संभावना बढ़ जाती है।
गौरतलब है कि इस वर्ष धराली, जम्मू कश्मीर, वैष्णो देवी, रामवन, किश्तवाड़ सहित कई स्थानों पर बादल फटने की घटनाएं सामने आई हैं। जिनमे व्यापक पैमाने पर तबाही देखने को मिली है।

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