सामूहिक दुष्कर्म को साबित करने के लिए हमेशा यह जरूरी नहीं कि निजी अंगों पर चोट हो
इस टिप्पणी संग न्यायालय ने संदेह का लाभ देते हुए दुष्कर्म के तीन दोषियों को सजा से मुक्त कर दिया है, लेकिन मुख्य आरोपी इरफान उर्फ गोलू की 20 साल की सजा बरकरार रखी है।
यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की एकल पीठ ने दिया है।
महोबा के चरखारी थाने में जनवरी 2015 को एक मुकदमा दर्ज कराया गया था। इसमें 15 वर्षीय पीड़िता ने आरोप लगाया था कि उसे शराब पिलाकर चार लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया। ट्रायल कोर्ट ने मार्च 2017 के आदेश से इरफान उर्फ गोलू, इरफान, रितेश उर्फ शानू और मानवेंद्र उर्फ कल्लू को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को 20 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई तो फैसले हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता ने दलील दी कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता के निजी अंगों पर कोई चोट के निशान नहीं पाए गए हैं। मुख्य आरोपी के अतिरिक्त तीन आरोपियों के नाम पीड़िता ने एफआईआर में दर्ज नहीं कराए थे। घटना के लगभग आठ महीने बाद अदालत में पीड़िता के बयान में तीनों का नाम आया। वहीं, तीनों आरोपियों की परेड नहीं कराई गई।
न्यायालाय ने कहा कि जहां पीड़िता का मौखिक बयान विश्वसनीय और सुसंगत होता है, वहां चिकित्सीय साक्ष्य के ऊपर इसे प्राथमिकता दी जाएगी। पीड़िता लगातार इस बात पर कायम रही कि उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। उच्च न्यायालाय ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से पलट दिया। दोषी ठहराए गए इरफान, रितेश और मानवेंद्र को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। वहीं, कोर्ट ने मुख्य आरोपी इरफान उर्फ गोलू की अपील खारिज कर सजा बरकरार रखी। इरफान और गोलू की सजा इसलिए बरकार रखी गई है क्योंकि, वह एक मात्र इस आरोपी था जिसे पीड़िता पहके से जानती थी और जिसका नाम घटना के तुरंत बाद दर्ज कराई गई प्राथमिक शिकायत में भी था।

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