सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व: स्वामी शांडिल्य महाराज

प्रयागराज, (दिनेश तिवारी)प्रयागराज मे  श्रृंगवेरपुर धाम के  जगदगुरू नारायणाचार्य स्वामी शांडिल्य महाराज ने बताया कि सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का बहुत अधिक धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है।उन्होने बताया कि सनातन संस्कृति में अश्विन मास की पूर्णिमा का अपना विशेष महत्व है। इसे शरद पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। शरद पूर्णिमा को आनंद व उल्लास का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व का धार्मिक व वैज्ञानिक महत्व भी है।

उन्होंने रविवार को बताया कि स्नान दान की पूर्णिमा सोमवार को मनाई जाएगी | ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान शंकर एवं माँ पार्वती कैलाश पर्वत पर रमण करते हैं तथा संपूर्ण कैलाश पर्वत पर चंद्रमा जगमगा जाता है जिसकी भव्य आभा होती है।

उन्होंने बताया कि भगवान कृष्ण ने भी शरद पूर्णिमा को रासलीला की थी। उन्होंने बताया कि मथुरा-वृंदावन सहित अनेक स्थानों पर इस रात को रामलीला का आयोजन किया जाता है। लोग शरद पूर्णिमा को व्रत भी रखते हैं, तथा शास्त्रों में इसे कौमुदी व्रत भी कहा गया है। लंकापति रावण शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था।इस प्रक्रिया से उसे पुनर्यौवन शक्ति प्राप्त होती थी।

उन्होने बताया कि शरद पूर्णिमा की रात में 10 से मध्य रात्रि 2 बजे के बीच कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है। सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और अश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है।

श्रृंगवेरपुर धाम पीठाधीश्वर ने बताया कि पूर्णिमा को चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है जिससे चंद्रमा के प्रकाश की किरणें पृथ्वी पर स्वास्थ्य की बौछार करती हैं। इस दिन चंद्रमा की किरणों में विशेष प्रकार के लवण व विटामिन होते हैं। उन्होंने बताया कि कहा जाता है कि इस दिन चंद्रमा की किरणों से नाग का विष भी अमृत बन जाता है। कहा कि ऐसी भी मान्यता है कि प्रकृति इस दिन धरती पर अमृत वर्षा करती है।

उन्होंने बताया कि एक अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है। यह परंपरा विज्ञान पर आधारित है।

उन्होंने बताया कि शोध के अनुसार खीर को चांदी के पात्र में बनाना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधकता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। चांदी पात्र की अनुपस्थिति में मिट्टी की हांड़ी में खीर बनाना चाहिए । इस खीर में हल्दी का उपयोग निषिद्ध है। उन्होंने बताया कि शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा का पूजन कर भोग लगाया जाता है, जिससे आयु बढ़ती है व चेहरे पर कान्ति आती है , एवं शरीर स्वस्थ रहता है।

स्वामी शांडिल्य महराज ने बताया कि शरद पूर्णिमा की रात में वैद्यों द्वारा जड़ी बूटियों से औषधि का निर्माण किया जाता है। माना जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात को तैयार की गई औषधि अचूक रामबाण होती है। चंद्रमा की रात में खुले मुंह के बर्तन में खीर पकाई जाती है जिसमें चंद्र किरणों का समावेश होने से अमृत रूपी यह खीर अनेक रोगों के लिए दवा का काम करती है। उन्होने बताया कि इस खीर को प्रातः काल स्नान करने के बाद लेकिन सूर्योदय से पहले खाना चाहिए, तभी उसका लाभ मिलता है।

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