उत्तर प्रदेश में पार्टी विधायकों की जातिगत बैठकों पर सख्त हुयी भाजपा
लखनऊ, 27 दिसंबर (वार्ता) उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा ) ने संगठन के भीतर बढ़ती जातिगत गतिविधियों पर सख्ती दिखाते हुए अनुशासन मजबूत करने की पहल की है। हाल के दिनों में पार्टी के भीतर अलग-अलग जातीय समूहों की बैठकों को लेकर नेतृत्व में असहजता देखी जा रही है।
इसका ताजा कारण शीतकालीन सत्र के दौरान गोमतीनगर स्थित एक भाजपा विधायक के आवास पर पार्टी के 50 से अधिक ब्राह्मण विधायकों की बंद कमरे में हुई बैठक है, जिसे भोज के नाम पर आयोजित किया गया था। इस बैठक को लेकर नवनियुक्त प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने कड़ा रुख अपनाया है।दरअसल अगस्त में मानसून सत्र के दौरान भाजपा के करीब 50 ठाकुर विधायकों की भी इसी तरह की बैठक हुई थी। लगातार हो रही ऐसी बैठकों को लेकर पार्टी नेतृत्व को आशंका है कि यदि इन्हें रोका नहीं गया तो ये संगठित दबाव समूह का रूप ले सकती हैं और पार्टी की समावेशी राजनीति की छवि को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
पार्टी के मीडिया सेल की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में पंकज चौधरी ने बिना किसी बैठक का नाम लिए स्पष्ट चेतावनी दी कि भविष्य में किसी भी प्रकार की जाति-आधारित बैठक को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भाजपा “परिवार या जाति आधारित राजनीति” में विश्वास नहीं रखती।
पंकज चौधरी ने कहा, “जो भी गतिविधि पार्टी की समावेशी विचारधारा को कमजोर करती है, उसे पार्टी संविधान के तहत अनुशासनहीनता माना जाएगा। यदि कोई जनप्रतिनिधि भविष्य में ऐसी गतिविधियों को दोहराता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।”
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने पार्टी नेताओं और जनप्रतिनिधियों से नकारात्मक नैरेटिव से बचने और संगठनात्मक अनुशासन में रहकर काम करने की अपील की। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकास और राष्ट्रवाद की राजनीति के सामने प्रदेश में विपक्ष की जाति-आधारित राजनीति अपने अंत की ओर है।
पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष का यह असामान्य रूप से सख्त बयान इस बात का संकेत है कि नेतृत्व जातिगत राजनीति को लेकर गंभीर चिंता में है, खासकर तब जब इसका असर पार्टी की चुनावी रणनीति और सामाजिक संतुलन पर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा, “ भाजपा ने 2014 से उत्तर प्रदेश में गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलितों और सवर्ण वर्गों को साथ लेकर एक व्यापक सामाजिक गठबंधन खड़ा किया है। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में इस संतुलन में दरार के संकेत मिले, जब समाजवादी पार्टी ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले के दम पर राज्य में 37 सीटें जीत लीं, जबकि भाजपा को 33 सीटों पर संतोष करना पड़ा।”
सूत्रों के मुताबिक कुछ विधायक 5 जनवरी को फिर से ऐसी बैठक करने की योजना बना रहे थे। अब देखना होगा कि नेतृत्व की चेतावनी के बाद वे अपने कदम पीछे खींचते हैं या नहीं और क्या पार्टी के अन्य जातीय समूह भी ऐसी बैठकों से परहेज करते हैं।

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