विस्मिल की याद में गोरखपुर में बन रहा है विरासत गलियारा
गोरखपुर 17 दिसम्बर (वार्ता) उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित घंटाघर वह एतिहासिक स्थल है जहां अंतेष्टि से पहले जनता दर्शन दर्शन के लिए आजादी के आन्दोलन में प्राण न्योछावर करने वालों में काकोरी कांड के महानायक स्व. राम प्रसाद बिस्मिल का पार्थिव शरीर रखा गया था आज उस स्थान पर विरासत गलियारा का निर्माण किया जा रहा है।।
घंटाघर के आस-पास की दुकानें खंडहर में बदल गयी है और लोग इस बात की प्रतीक्षा में हैं कि इस विरासत गलियारा पंडित विस्मिल गलियारा के स्प में स्थापित होगा और यहीं पंडित विस्मिल का प्रतिमा घंटाघर में लगेगी।आजादी के आन्दोलन में प्राण न्योछावर करने वालों में काकोरी कांड के महानायक स्व. राम प्रसाद बिस्मिल का नाम इतिहास केस्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्हें 19 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर जिला जेल में फांसी दी गयी थी।
देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए चले संघर्ष के लंबे कालखंड में काकोरी ट्रेन एक्शन का अविस्मरणीय योगदान है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के इस अभूतपूर्व प्रतिकार ने बर्तानिया हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। इस प्रतिकार के बाद तेज होती गई स्वतंत्रता आंदोलन की आंधी के चलते दो सौ साल तक देश पर शासन करने वाली अंग्रेज साम्राज्य को अगले बीस साल के अंदर भारत छोड़ देने को मजबूर होना पड़ा।
इस महान बलिदानी पंडित बिस्मििल का शव बर्बर अंग्रेजों ने तीन दिनों तक गोरखपुर के घंटाघर पर लटकाये रखा था। इस क्रान्तिकारी शायर का यह शेर आज भी प्रेरणा देता है।
...शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ।
वतन पर मिटने वालों का यही बांकी निशां होगा
देश की गुलामी की जंजीरों से रिहायी दिलाने वाले अमर क्रान्तिकारियों में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का नाम सबसे ऊपर लिखा जायेगा। उत्तर प्रदेश का गोरखपुर जिला जेल पंडित बिस्मिल के जीवन के आखिरी दिनों का साक्षी है जहां अन्त में इस क्रान्तिकारी को फांसी की सजा दी गयी। वर्ष 1857 के गदर की घटनाओं के बाद क्रान्तिकारी आन्दोलन के सम्बंध में उत्तर प्रदेश में जो पहला बलिदान मातृ वेदी पर हुआ वह काकोरी षडयंत्र के नाम से राष्ट्रीय आजादी के इतिहास में प्रसिध्द हुआ जिसके नायक थे पंडित
राम प्रसाद बिस्मिल।
पंडित बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 में शाहजहांपुर में हुआ था। इनके पितामह ग्वालियर राज्य के मूल निवासी थे और दादा गृहकलह से उब कर शाहजहांपुर में आकर बस गये । जिस विस्मिल को परतंत्र भारत की जालिम ब्रिटिश सरकार की अदालत
ने उत्तर भारत से सशस्त्र क्रांतिकारी दल का मुख्य कार्यकर्ता और नेता घोषित कर प्राण दंड प्रदान किया वह बिस्मिल क्रान्तिकारी आन्दोलन में कैसे आये यह कहानी भी मार्मिक हैं। 1915 तक बिस्मिल आर्य समाज के माध्यम से राजनीति में रूचि लेना शुरू कर दिये थे। इन्ही दिनों में सोमदेव जी नामक एक महात्मा से इनकी मुलाकात हो गयीं जो इन्हें धार्मिक और राजनीतिक उपदेश देने लगे। स्वामी बिस्मिल से अक्सर कहा करते थे कि एन्ट्रेस पास करके यूरोप यात्रा करना इटली जाकर महात्मा मैजिन की जन्मभूमि का दर्शन अवश्य करना।
सन 1916 में लाहौर षडयंत्र का मुकदमा चला और भाई परमानंद को फांसी की सजा मिली। इस खबर को पढकर बिस्मिल के बदन में आग लग गयी। उन्होंने बिचारा कि अंग्रेज बडे अत्याचारी हैं इनके राज्य में न्याय नहीं है, जो इतने बडे महानुभाव को फांसी की सजा दे दी। बिस्मिल ने प्रतीज्ञा किया कि इसका बदला जरूर लूंगा और जीवन भर अंग्रेजी राज्य को विध्वंस करने का प्रयत्न करता रहुंगा।
बिस्मिल मैट्रिक में पढ रहे थे उसी समय पंडित गेंदालाल दीक्षित के सम्पर्क में आये और वे मैनपुरी षडयंत्र में दीक्षित की काफी सहायता किया। इस षडयंत्र में दीक्षित जी जब पकडे गये तो बिस्मिल ने उन्हें छुडाने के लिए 15 विद्यार्थियों को साथ लेकर एक ब्रिटिश सरकार के कारकून के घर को लूटा।
पंडित बिस्मिल ने देशवासियों के नाम संदेश का पर्चा छपवाया और उसे उत्तर प्रदेश के 48 जिलों में एक साथ बंटवाया। यह पर्चा पंडित गेंदा लाल दीक्षित की ग्वालियर में गिरफतारी के प्रतिशोध में छपवाया गया था। रातों रात पूरे प्रदेश में एक साथ पर्चे बटने से अंग्रेज हुकूमत ने इसे बडी चुनौती माना और इस पर्चे तथा पुस्तक अमरीका को आजादी कैसे मिली दोनो को सरकार ने जब्त कर लिया। यहीं से पंडित बिस्मिल का क्रान्तिकारी नेतृत्व उभरा और पूरे भारत में इन्होंने सशस्त्र क्रांतिकारी संगठन का नाम हिन्दूस्तान रिपलिकन एशोसिएशन था। इस दल ने पूरे उत्तर भारत में अपना विस्तार प्रारम्भ किया।
मैनपुरी षडयंत्र बिस्मिल पर भी वारंट निकल गया। वारंट निकलने की खबर बिस्मिल को मिल गयी औार वह तत्काल फरार हो गये। इसी बीच मन की लहर नाम से कविताओं का संग्रह उन्होने प्रकाशित किया जिसकी प्रतियों को अंग्रेजी शासन ने जब्त कर लिया। अपने फरारी के जीवन में बिस्मिल का मुख्य क्षेत्र आगरा के आस पास रहा।
बिस्मिल ने इस वक्त अपना नाम बदल कर रूप सिंह रख लिया था। रूप और राम नाम से इनहोंने तमाम पत्र पत्रिकाओं में लेख छपवाये। रूप नाम से इन्होंने एक छोटे सरकारी अस्पताल के डाक्टर के छुट्टी पर जाने पर उसकी जगह चिकित्सक का कार्य भी किया। इसी फरारी की अवस्था में अपने छोटे भाई सुशील के नाम से ..सूशील ग्रन्थ माला..भी शंुरू किया और छह पुस्तके मन की
लहरए बोलसेविकों की करतूतए केथोराइन स्वदेशी रंग और दो बंगला से अनुवादित
कर प्रकाशित किया।
बिसिमल संस्कृत, हिन्दी, बंगला, उर्दू और अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे। इन दिनों इनकी गिरफतारी पर 200 रूपये का पुरस्कार अंग्रेजी सरकार ने घोषित किया था।
मैनपुरी षडयंत्र बिस्मिल पर भी वारंट निकल गया। वारंट निकलने की खबर बिस्मिल को मिल गयी औार वह तत्काल फरार हो गये। इसी बीच मन की लहर नाम से कविताओं का संग्रह उन्होने प्रकाशित किया जिसकी प्रतियों को अंग्रेजी शासन ने जब्त कर लिया। अपने फरारी के जीवन में बिस्मिल का मुख्य क्षेत्र आगरा के आस पास रहा।
बिस्मिल ने इस वक्त अपना नाम बदल कर रूप सिंह रख लिया था। रूप और राम नाम से इनहोंने तमाम पत्र पत्रिकाओं में लेख छपवाये। रूप नाम से इन्होंने एक छोटे सरकारी अस्पताल के डाक्टर के छुट्टी पर जाने पर उसकी जगह चिकित्सक का कार्य भी किया। इसी फरारी की अवस्था में अपने छोटे भाई सुशील के नाम से ..सूशील ग्रन्थ माला..भी शंुरू किया और छह पुस्तके मन की
लहरए बोलसेविकों की करतूतए केथोराइन स्वदेशी रंग और दो बंगला से अनुवादित
कर प्रकाशित किया।
बिसिमल संस्कृत, हिन्दी, बंगला, उर्दू और अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे। इन दिनों इनकी गिरफतारी पर 200 रूपये का पुरस्कार अंग्रेजी सरकार ने घोषित किया था।
देश के राजनैतिक हालात को जानने के लिए बिस्मिल बराबर अखबार पढा करते थे और तमाम नवजवान इनसे इतने प्रभावित रहे कि इनहें वे सदैव चारो तरफ से घेरे रहते थे। अपने क्रान्तिकारी विचारों के प्रतिपादन के लिए इस दल को धन की बड़ी जरुरत थी क्योंकि मां भारती को अंग्रेजों के खूनी पंजे से छुडाने के लिए इन्हें कोई चन्दा भी नहीं देता था इसीलिए इस दल के लोग अंग्रेंज हुकूमत के सहयोगियों और प्रशंसकों को लूटकर अपने उद्देश्यों की पूर्ति करते थें लेकिन बाद में बिस्मिल ने देशवासियों की जगह सरकारी खजानों को ही छीनने का लक्ष्य बनाया और सरकार के छीने धन से हथियार,गोला, बारूद और अन्य आवश्यक
शस्त्र खरीदे जाने लगे।
पंडित बिस्मिल के नेतृत्व में क्रानितकारियों का दल 9 अगसत 1925 को 8 डाउन सराहनपुर, लखनउ सवारी गाडी पर सवार हुए। चूंकि तीसरे दर्जे की जंजीर अक्सर खराब रहती थी इस वास्ते सेकेन्ड क्लास के डिब्बे जंजीर खींचने के लिए उस डिब्बे में अशफाकुलला खां वारसी,राजेन्द्र नाथ लाहिडी और शचीन्द्र नाथ एक साथ ट्रेन पर बैठे। तीसरे दर्जे के डिब्बे में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल केशव चक्रवर्ती, मुरारी लालए मुकुन्दी लाल, चन्द्रशेखर आजाद, बनवारी लाल और मन्मथ नाथ गुप्त सवार हुए। बिस्मिल ने अपने सभी साथियों को काम बांट दिया। दूसरे दर्जें के लोंगों को जंजीर खींचकर गाडी खडी होने के बाद अन्य सहयोगियों को गार्ड को पकड लेने और खजाने वाले बाक्स को कब्जे में ले लेने का कार्य सौंप दिया गया।
सन्ध्या के समय काकोरी रेलवे स्टेशन से आगे तार के 8वें खम्भे के पास गाडी खडी कर दी गयी। गार्ड के ड्राइबर का बुरा हाल था। बकसा नीचे गिरा दिया गया। लाइन के दोनो ओर दो दो आदमी माउजर पिस्तौल लिए खडे किये गये थे। माउजर पर कुन्दे चढाकर राइफल की शक्ल बना दिया गया था। इस गाडी में कुछ अंग्रेज फौजी भी थें
क्रान्तिकारियों ने एलान कर दिया था कि हम किसी मुसाफिर को नहीं लूटेंगे। केवल सरकारी खजाना ही लेने का हम लोंगों का लक्ष्य है जो जहां है वही रहे, हिले डूले नहीं। बिस्मिल ने सुरक्षा का भार अनुभवी लोंगों को सौंप रखा था जिन्हे यह हिदायत दी गयी कि गाडी के समानानतर हवा में गोलियां थोड़ी देर बाद दागते रहे जब तक कोई मुकाबले में न आवे गोली न मारी जाय। बिस्मिल ने
अंग्रेजी खजाना के इस लूट को नर हत्या करा कर भयानक रूप नहीं देना चाहते थे लेकिन एक सज्जन ने जिनका काम गोली चलाना नहीं था माउजर चला दिया जो एक यात्री को लग गया। क्रान्तिकारियों ने रूपयों को चादर में बांधा और आ गये। रास्ते में किसी ने भी रोका टोका नही और इस घटना से चारो तरफ सनसनी फैल गयी।
शस्त्र खरीदे जाने लगे।
पंडित बिस्मिल के नेतृत्व में क्रानितकारियों का दल 9 अगसत 1925 को 8 डाउन सराहनपुर, लखनउ सवारी गाडी पर सवार हुए। चूंकि तीसरे दर्जे की जंजीर अक्सर खराब रहती थी इस वास्ते सेकेन्ड क्लास के डिब्बे जंजीर खींचने के लिए उस डिब्बे में अशफाकुलला खां वारसी,राजेन्द्र नाथ लाहिडी और शचीन्द्र नाथ एक साथ ट्रेन पर बैठे। तीसरे दर्जे के डिब्बे में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल केशव चक्रवर्ती, मुरारी लालए मुकुन्दी लाल, चन्द्रशेखर आजाद, बनवारी लाल और मन्मथ नाथ गुप्त सवार हुए। बिस्मिल ने अपने सभी साथियों को काम बांट दिया। दूसरे दर्जें के लोंगों को जंजीर खींचकर गाडी खडी होने के बाद अन्य सहयोगियों को गार्ड को पकड लेने और खजाने वाले बाक्स को कब्जे में ले लेने का कार्य सौंप दिया गया।
सन्ध्या के समय काकोरी रेलवे स्टेशन से आगे तार के 8वें खम्भे के पास गाडी खडी कर दी गयी। गार्ड के ड्राइबर का बुरा हाल था। बकसा नीचे गिरा दिया गया। लाइन के दोनो ओर दो दो आदमी माउजर पिस्तौल लिए खडे किये गये थे। माउजर पर कुन्दे चढाकर राइफल की शक्ल बना दिया गया था। इस गाडी में कुछ अंग्रेज फौजी भी थें
क्रान्तिकारियों ने एलान कर दिया था कि हम किसी मुसाफिर को नहीं लूटेंगे। केवल सरकारी खजाना ही लेने का हम लोंगों का लक्ष्य है जो जहां है वही रहे, हिले डूले नहीं। बिस्मिल ने सुरक्षा का भार अनुभवी लोंगों को सौंप रखा था जिन्हे यह हिदायत दी गयी कि गाडी के समानानतर हवा में गोलियां थोड़ी देर बाद दागते रहे जब तक कोई मुकाबले में न आवे गोली न मारी जाय। बिस्मिल ने
अंग्रेजी खजाना के इस लूट को नर हत्या करा कर भयानक रूप नहीं देना चाहते थे लेकिन एक सज्जन ने जिनका काम गोली चलाना नहीं था माउजर चला दिया जो एक यात्री को लग गया। क्रान्तिकारियों ने रूपयों को चादर में बांधा और आ गये। रास्ते में किसी ने भी रोका टोका नही और इस घटना से चारो तरफ सनसनी फैल गयी।
खुफिया पुलिस यह समझ गयी कि यह काम साधारण डाकुओं का नहीं हो सकता क्योंकि वह तो प्रायः असहाय यात्रियों का ही धन लूटते हैं। इस घटना के दूसरे दिन 10 अगस्त को समाचार पत्रो में इस भीषण ट्रेन डकैती का जब रोमांचकारी विवरण छपा तभी से पुलिस की निगाह में क्रांतिकारी चढ गये और शाहजहांपुर में मुखबिरी होने लगी। विशेष दस्ते के प्रभारी हार्ट्रन नियुक्त हुए।
10 अगस्त को खुफिया विभाग वालों ने बिस्मिल का पता लगाया तो यह मालुम हुआ कि वह बाहर हैं। गिरफ्तारियां शुरू हुयी ओर 26 सितंबर नौ दुर्गा के दिन सुबह दातवन करते समय बिस्मिल गिरफ्तार कर लिये गये।
काकोरी षडयंत्र में कुल 36 लोग गिरफ्तार हुए। 28 नवजवानों पर मजिस्ट्रेट के यहां चार्जसीट आयी। दो पर से मुकदमा हटा दिया गया। सरकारी गवाह बनाकर मांफी दी गयी। 24 को मजिस्ट्रेट एनेउददीन ने सेशन सुपुर्द किया।
छह अप्रैल 1927 को सत्र न्यायरधीश मिस्टर हैमिल्टन ने अपने 115 पेज के फैसले में पंडित बिस्मिल को निर्दयी और हत्यारा सम्बोधित कर यह लिखा कि राम प्रसाद बिस्मिल को तब तक फांसी पर लटकाया जाय जब तक प्राण न निकल जाय। बिस्मिल ने 18 जुलाई 1927 को अवध चीफ कोर्ट में सजा कम करने और पुनः विचारार्थ याचिका दाखिल की गयी मगर चीफकोर्ट के जजों ने याचिका अस्वीकार कर दी।
बिस्मिल ने फांसी से तीन दिन पूर्व यानी 16 दिसम्बर 1927 में गोरखपुर जिला जेल जो आत्म कथा लिखी है,उसमें अपने कार्यों का जिक्र किया है। बिस्मिल जी जिला जेल की कोठरी नंबर आठ में रहते हुए लिखते हैं “ मुझे इस कोठरी में बडा आनन्द आ रहा है। वे वहां से लिखे अपने मां को एक पत्र में कहा कि तुम्हे मेरी मौत की दर्दनाक खबर सुनायी जायेगी। मां मुझे यकीन है कि तुम
सहन कर लोगी क्योंकि तुम्हारा बेटा माताओं की माता भारत माता की सेवा में जिन्दगी को कुर्बान कर रहा है। उसने तुम्हारे परिवार पर कोई आंच नहीं आने दी बल्कि उसका रूतबा बुलन्द किया।
19 दिसमबर 1927 को प्रातः दैनिक क्रिया क्लाप, स्नान आदि से निवृत होकर प्रातः काल साढे छह बजे बन्देमातरम और भारत माता की जय बोलते हुए पं.0 राम प्रसाद बिसिमल फांसी पर झूल गये। फांसी पर झूलते समय ओंम का ऐसा उच्चारण उन्होने किया जो काफी देर तक आकाश में गूंजता रहा।
गोरखपुर जिला जेल में स्थित पंडित विस्मिल की शहीद स्थली का द्वार आमजन के लिए पिछले 15 दिसम्बर 1918 को खोल दिया गया है। जेल प्रशासन ने शहीद उद्यान और फांसी घर के बीच में खडी चारदिवारी तोड दी है। अब बिना जेल के अन्दर गये ही आम लोग शहीद स्थली के दर्शन कर सकेगे। इसके पहले सुरक्षा का हवाला देते हुए जेल प्रशासन ने राम प्रसाद बिस्मिल शहीद स्थली पर लगे गेट को बन्द कराकर वहां दिवार चलवा दी थी जिसके बाद शहीद स्थली पहुंचने के लिए जेल के भीतर से होकर जाना पडता था। गेट खुलवाने के लिए समाजसेवी संगठनों और आमजन ने जेल प्रशासन के फैसले का विरोध किया मगर सुनवायी नहीं हुयी थी। इसके बाद समाजसेवी संगठनों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर इसकी जानकारी दी और उन्होंने शहीद स्थली का गेट खोलने का निर्णय लिया था।
10 अगस्त को खुफिया विभाग वालों ने बिस्मिल का पता लगाया तो यह मालुम हुआ कि वह बाहर हैं। गिरफ्तारियां शुरू हुयी ओर 26 सितंबर नौ दुर्गा के दिन सुबह दातवन करते समय बिस्मिल गिरफ्तार कर लिये गये।
काकोरी षडयंत्र में कुल 36 लोग गिरफ्तार हुए। 28 नवजवानों पर मजिस्ट्रेट के यहां चार्जसीट आयी। दो पर से मुकदमा हटा दिया गया। सरकारी गवाह बनाकर मांफी दी गयी। 24 को मजिस्ट्रेट एनेउददीन ने सेशन सुपुर्द किया।
छह अप्रैल 1927 को सत्र न्यायरधीश मिस्टर हैमिल्टन ने अपने 115 पेज के फैसले में पंडित बिस्मिल को निर्दयी और हत्यारा सम्बोधित कर यह लिखा कि राम प्रसाद बिस्मिल को तब तक फांसी पर लटकाया जाय जब तक प्राण न निकल जाय। बिस्मिल ने 18 जुलाई 1927 को अवध चीफ कोर्ट में सजा कम करने और पुनः विचारार्थ याचिका दाखिल की गयी मगर चीफकोर्ट के जजों ने याचिका अस्वीकार कर दी।
बिस्मिल ने फांसी से तीन दिन पूर्व यानी 16 दिसम्बर 1927 में गोरखपुर जिला जेल जो आत्म कथा लिखी है,उसमें अपने कार्यों का जिक्र किया है। बिस्मिल जी जिला जेल की कोठरी नंबर आठ में रहते हुए लिखते हैं “ मुझे इस कोठरी में बडा आनन्द आ रहा है। वे वहां से लिखे अपने मां को एक पत्र में कहा कि तुम्हे मेरी मौत की दर्दनाक खबर सुनायी जायेगी। मां मुझे यकीन है कि तुम
सहन कर लोगी क्योंकि तुम्हारा बेटा माताओं की माता भारत माता की सेवा में जिन्दगी को कुर्बान कर रहा है। उसने तुम्हारे परिवार पर कोई आंच नहीं आने दी बल्कि उसका रूतबा बुलन्द किया।
19 दिसमबर 1927 को प्रातः दैनिक क्रिया क्लाप, स्नान आदि से निवृत होकर प्रातः काल साढे छह बजे बन्देमातरम और भारत माता की जय बोलते हुए पं.0 राम प्रसाद बिसिमल फांसी पर झूल गये। फांसी पर झूलते समय ओंम का ऐसा उच्चारण उन्होने किया जो काफी देर तक आकाश में गूंजता रहा।
गोरखपुर जिला जेल में स्थित पंडित विस्मिल की शहीद स्थली का द्वार आमजन के लिए पिछले 15 दिसम्बर 1918 को खोल दिया गया है। जेल प्रशासन ने शहीद उद्यान और फांसी घर के बीच में खडी चारदिवारी तोड दी है। अब बिना जेल के अन्दर गये ही आम लोग शहीद स्थली के दर्शन कर सकेगे। इसके पहले सुरक्षा का हवाला देते हुए जेल प्रशासन ने राम प्रसाद बिस्मिल शहीद स्थली पर लगे गेट को बन्द कराकर वहां दिवार चलवा दी थी जिसके बाद शहीद स्थली पहुंचने के लिए जेल के भीतर से होकर जाना पडता था। गेट खुलवाने के लिए समाजसेवी संगठनों और आमजन ने जेल प्रशासन के फैसले का विरोध किया मगर सुनवायी नहीं हुयी थी। इसके बाद समाजसेवी संगठनों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर इसकी जानकारी दी और उन्होंने शहीद स्थली का गेट खोलने का निर्णय लिया था।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें