बसंत ऋतु महज ऋतु परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति में नवचेतना, उत्साह और रचनात्मकता का प्रतीक है
शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी के नाम से भी जाता है। बसंत पंचमी हर वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष के पंचमी तिथि को मनाया जाता है। बसंत पंचमी विद्या, बुद्धि, ज्ञान, कला और संगीत की देवी मां सरस्वती के प्राकट्य का पर्व है। बसंत में प्रकृति जड़ता त्यागकर नए पत्ते, फूल और कोयल की कूक के साथ पुनर्जीवित हो उठती है, जो विकास और सकारात्मकता का प्रतीक है।
शैव संप्रदाय के श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के जगद्गुरु, सूर्याचार्य कृष्णदेव नंद गिरी महाराज ने बसंत पंचमी स्नान पर्व के अवसर पर बताया कि पीला रंग सादगी और निर्मलता को दर्शाता है | यह रंग हमारे जीवन पर गहरा असर डालती है। हिन्दू धर्म में पीले रंग को शुभ माना गया है। पीला रंग शुद्ध और सात्विक प्रवृत्ति का प्रतीक माना जाता है। पीला रंग भारतीय परंपरा में शुभ का प्रतीक माना गया है।
उन्होंने बताया कि फेंगशुई ने भी इसे आत्मिक रंग अर्थात आत्मा या अध्यात्म से जोड़ने वाला रंग बताया है। फेंगशुई के सिद्धांत ऊर्जा पर आधारित हैं। पीला रंग सूर्य के प्रकाश का है यानी यह ऊष्मा शक्ति का प्रतीक है। पीला रंग हमें तारतम्यता, संतुलन, पूर्णता और एकाग्रता प्रदान करता है। यह रंग डिप्रेशन दूर करने में कारगर है। यह उत्साह बढ़ाता है और दिमाग सक्रिय करता है। यह आत्मविश्वास में भी वृद्धि करता है। हम पीले परिधान पहनते हैं तो सूर्य की किरणें प्रत्यक्ष रूप से दिमाग पर असर डालती हैं।
जगद्गुरू, सूर्याचार्य कृष्णदेव नंद गिरी महाराज ने कहा कि बसंत ऋतु को ऋतुओं का राज्य कहा जाता है | यह ऋतु परिवर्तन नहीं बल्कि नवचेतना और रचनात्मकता का प्रतीक है | यह शीत की जड़ता को तोड़कर नई आशा, जीवन और रंगों (विशेषकर सरसों का पीलापन) के आगमन का उत्सव है। बसंत ऋतु से पंचतत्व जल ,वायु , धरती , आकाश और अग्नि का प्रभाव संतुलित हो जाता है | धरती हरियाली से भर जाती है और वातावरण मे नई ऊर्जा का संचार होता है | प्रयागराज के संगम सहित देश भर मे लाखों श्रद्धालु स्नान, दान और पूजन करते हैं|
इस दिन विद्या कि देवी सरस्वती कि पूजा कि जाती है | यह भारत, बांगलादेश, नेपाल और कई अन्य राष्ट्रों में बड़े उल्लास के साथ मनाई जाती है। पुराणों -शास्त्रों तथा अनेक काव्य ग्रंथों में भी अलग अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है। उन्होंने बताया देवी सरस्वती के हाथों में वीणा है। उन्होंने बताया कि वीणा का अर्थ है संतुलन, मनुष्य किसी भी धर्म , पंथ, संप्रदाय का हो, उसका जीवन संतुलित होना चाहिए। जिसके जीवन में संतुलन नहीं मधुर संगीत की झंकार नहीं आ सकती। उन्होंने बताया कि सरस्वती देवी का शुभ्र वस्त्र पवित्रता और सौम्यता का प्रतीक है। शुभ्र रंग संदेश देता है कि हमारा जीवन पवित्र होना चाहिए। उसमें शुचिता होनी चाहिए।
उन्होंने बताया कि ज्ञान, विद्या, संतुलन, समस्थिति, कला, इन सब विधाओं का देवी सरस्वती के रूप में एक रूपकात्मक विग्रह हमें जीवन में प्राप्त हुआ है। बसंत पंचमी की सार्थकता तभी मानी जाएगी जब हम अपने जीवन में शुद्धता, सुचिता, कलात्मकता, अध्ययन आए। देवी सरस्वती के वास्तविक स्वरूप को समझकर उसका आत्मसात करें।

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