पिता की मौत के सदमे से उबर कर परेड में मार्चिंग दस्ते का नेतृत्व करेंगी कैप्टन समीरा बुट्टर
नयी दिल्ली 23 जनवरी (वार्ता) गणतंत्र दिवस परेड में अपने मार्चिंग दस्ते का नेतृत्व करने वाली सेना की कैप्टन समीरा बुट्टर के हाथ में उस दिन केवल दस्ते की कमान ही नहीं बल्कि स्मृतियां, व्यक्तिगत क्षति और कर्तव्य के प्रति अटूट संकल्प भी होगा।
77वें गणतंत्र दिवस परेड में 'इंटीग्रेटेड ऑपरेशंस सेंटर' झांकी की दस्ता कमांडर कैप्टन बुट्टर सेना के सर्वोच्च आदर्श 'सेवा परमो धर्म' की सजीव प्रतीक हैं। चौथी पीढ़ी की सैन्य अधिकारी कैप्टन बुट्टर इस राष्ट्रीय गौरव के क्षण में हाल ही में अपने पिता कर्नल सरबजीत सिंह बुट्टर (सेवानिवृत्त) के निधन के व्यक्तिगत दुख की छाया के साथ परेड में हिस्सा ले रही हैं।इस व्यक्तिगत छवि के बावजूद उन्होंने नेतृत्व का दायित्व संभालने का निर्णय लिया। वह कहती हैं, "इस गणतंत्र दिवस परेड में दस्ता कमांडर बनना मेरे पिता को मेरी श्रद्धांजलि है।" उनके शब्द कठिन अभ्यास और धैर्य से भरे कई हफ्तों की मेहनत की गूंज हैं।
यूनीवार्ता के साथ बातचीत में कैप्टन बुट्टर ने कहा कि देश के प्रति कर्तव्य उनकी रगों में बसता है। वह 19 पंजाब रेजिमेंट के महावीर चक्र से सम्मानित ब्रिगेडियर संपूरण सिंह बुट्टर (सेवानिवृत्त) की पोती हैं। चंडीगढ़ निवासी इस युवा अधिकारी ने कहा, "मैं बचपन से ही सेना में जाना चाहती थी। ऑपरेशन सिंदूर की सफलता को समर्पित झांकी की दस्ता कमांडर बनना किसी भी अधिकारी के लिए सपने के सच होने जैसा है।" हालांकि इस गणतंत्र दिवस परेड में उनके परिवार की उपस्थिति नहीं होगी।
उन्होंने कहा, "परिवार हाल ही में हुई क्षति के कारण परेड में शामिल नहीं हो पाएगा। लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे पिता ऊपर से मुझे वैसे ही प्रोत्साहित कर रहे होंगे, जैसे वे हमेशा करते थे।" उनके परदादा रिसालदार मेजर रत्तन सिंह ने भी कैवेलरी रेजिमेंट में सेवा दी थी।
अपनी झांकी के बारे में जानकारी देते हुए कर्तव्य पथ पर पहली बार उतर रही कैप्टन बुट्टर ने कहा, "इंटीग्रेटेड ऑपरेशनल सेंटर झांकी ऑपरेशन सिंदूर की सफलता को दर्शाती है। यह एक सच्चा 'पूरे राष्ट्र का प्रयास' था, जिसमें मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, सशस्त्र बल और देश की जनता एकजुट हुई। यह हमारी एकीकृत सोच, तैयारियों और स्वदेशी क्षमताओं को दर्शाती है और आत्मनिर्भर भारतीय सेना का सच्चा प्रतीक है।"
दिन प्रतिदिन उन्होंने अडिग एकाग्रता के साथ अभ्यास किया, अपने दुख को शक्ति में बदलते हुए अपने परिवार की सेवा परंपरा और अपनी वर्दी के सम्मान को निभाया। उनकी शांत चाल और सशक्त नेतृत्व में एक गहरा संदेश निहित है कि भारतीय सेना की भावना सबसे मानवीय क्षणों में भी अटूट बनी रहती है।

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