रामानंदाचार्य के आश्रम का जीर्णोद्धार कराएगी: योगी आदित्यनाथ
उन्होंने कहा कि “जाति-पाति पूछे नहीं कोई हरि को भजे सो हरि का होई,” यह अलख स्वामी रामानंदाचार्य ने प्रयागराज में ही जगाई थी। स्वामी रामानंदाचार्य भारत के महान संत, समाज-सुधारक और भक्ति आंदोलन के प्रमुख आचार्य थे। उन्होंने उत्तर भारत में रामभक्ति को जन-जन तक पहुंचाया और भक्ति को जाति-भेद से मुक्त किया। उनका जन्म लगभग 14वीं शताब्दी में माना जाताहै। वे वैष्णव संप्रदाय रामानुजाचार्य की परंपरा से जुड़े थे।
मुख्यमंत्री ने बताया कि वह भगवान राम में भक्ति में लीन रहते थे। उन्होंने प्रयागराज में काफी समय व्यतीत किया। उनका मुख्य स्थान काशी था। स्वामी रामानंदाचार्य जी का मानना था कि भक्ति का मार्ग सबके लिए है। रामानंदाचार्य ने कहा कि ईश्वर-भक्ति पर किसी जाति, वर्ग या लिंग का बंधन नहीं होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति रामभक्ति कर सकता है। जाति-पाति पूछे नहीं कोई जो हरि को भजे वह हरि का होई। उन्होंने संस्कृत के बजाय आम जनता की भाषा (अवधी-हिंदी) में उपदेश दिए ताकि हर व्यक्ति समझ सके।
उन्होंने पूरे जीवन काल में श्री राम नाम का प्रचार प्रसार किया। उनका मानना था कि नाम के जप और भक्ति को मोक्ष का सरल मार्ग है। उन्होंने ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। कबीरदास, रैदास (रविदास), धन्ना, सेन नाई और पीपा जैसा महान संत उनके शिष्य माने जाते हैं। इन संतों ने आगे चलकर भक्ति आंदोलन को पूरे भारत में फैलाया।

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