पेशकार को मकान का कब्जा दिलाने में सिविल जज व राजस्व अधिकारियों पर गिरी गाज

प्रयागराज,(दिनेश तिवारी) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सिद्धार्थनगर जिला अदालत के सिविल जज कनिष्ठ श्रेणी के खिलाफ दुर्भाग्यपूर्ण अवैध कार्यवाही करने के लिए विभागीय जांच शुरू करने के लिए पत्रावली मुख्य न्यायाधीश को भेज दी है,साथ ही संबंधित पेशकार के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई करने का आदेश दिया है।

न्यायालय ने कहा पेशकार के पक्ष में याची व परिवार को बेदखल कर मकान का कब्जा दिलाने में तहसीलदार बांसी व राजस्व टीम ने प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग किया और दुर्भाग्यपूर्ण कार्य किया,जिसकी जांच की जानी चाहिए।

न्यायालय ने मकान से बेदखल याची श्रीमती सोनी व अन्य हिस्सेदारों को 48 घंटे में मकान का कब्जा सौंपने का आदेश दिया है साथ ही पेशकार को निर्देश दिया है कि वह एक हफ्ते में याची को परेशान करने व अवैध बेदखली करने के एवज में एक लाख रुपए बतौर मुआवजा भुगतान करें। न्यायालय ने कहा यदि आदेश का पालन नहीं होता तो वसूली कार्यवाही कर एक माह के भीतर मुआवजे का याची को भुगतान कराया जाय।

 न्यायमूर्ति एम के गुप्ता तथा न्यायमूर्ति अरूण कुमार की खंडपीठ ने खेसराहा थाना क्षेत्र की श्रीमती सोनी की याचिका को निस्तारित करते हुए यह आदेश दिया है।

गौरतलब है कि एक पेशकार की पद की हनक व मनमानी के  कारण खुद उलझा ही और  सिविल जज कनिष्ठ श्रेणी सहित जिला राजस्व अधिकारियों को बुरी तरह फंसा दिया।

पेशकार ने याची महिला के शराबी पति व उसके एक भाई से अविभाजित पैतृक मकान का एक हिस्सा खरीद लिया और मकान पर कब्जे की कोशिश नाकाम होने पर सिविल वाद दायर कर तारीख पर तारीख लगवाते हुए एकपक्षीय अंतरिम निषेधाज्ञा आदेश प्राप्त कर लिया, और तहसीलदार ने कब्जा दिलाने के लिए राजस्व टीम बना दी।

पुलिस अधीक्षक (सिद्धार्थनगर) को पत्र लिखकर पुलिस बल व राजस्व की के जरिए जबरन मकान पर याची परिवार को बेदखल कर कब्जा ले लिया, जिस पर महिला ने उच्च न्यायालय की शरण ली। याची ने कहा बिना उसे सुने एकपक्षीय आदेश से अवैध कब्जा लिया गया है।उसे कब्जा वापस दिलाया जाय और अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाय।

याची का कहना था कि मकान उसके ससुर का है,उनकी मौत के बाद चार बेटों व मां के नाम दर्ज हो गया। याची मकान में स्थित दुकान चलाकर अपने बच्चों का गुजारा करती रही है। उसके पति की बुरी लत के कारण पेशकार ने उनका हिस्सा बैनामा करा लिया और अन्य हिस्सेदारों को पक्षकार भी नहीं बनाया,केवल एक को पक्षकार बनाकर एक पक्षीय आदेश प्राप्त कर लिया। मुकदमे की याची को भनक भी नहीं लगी।जब पेशकार कब्जा लेने आया तो स्थिति पता चली,तब याची ने उसने अदालत की शरण ली।

 न्यायालय ने कहा सिविल जज ने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया, मुकद्दमे की लगातार सुनवाई कर एकपक्षीय अध्यादेश पारित किया और प्रशासनिक अधिकारियों ने भी प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग किया। दुर्भाग्यपूर्ण कार्यवाही की।जिसकी जांच की जानी चाहिए।

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