माघ मेले में "गोल्डन और सिल्वर ब्वॉय" श्रद्धालुओं के बीच बने आकर्षण का केंद्र
सबसे दर्द भारी कहानी गोल्डन ब्वॉय की है | गोल्डन ब्वॉय के माता-पिता का साया एक-एक कर सिर से उठ गया। अचानक वह और उसका छोटा भाई अनाथ हो गए। जिस उम्र में बच्चे मां की गोद और पिता की उंगली थामकर चलना सीखते हैं, उसी उम्र में भानु ने खुद को मजबूत करने की कसम खा ली। उसने फैसला किया कि अब वह सिर्फ भाई नहीं रहेगा—वह छोटे भाई के लिए माता -पिता दोनों की भूमिका का निर्वहन एक साथ करेगा|
छोटे भाई की भूख, उसकी पढ़ाई, उसके कपड़े, उसकी सुरक्षा—हर जिम्मेदारी भानु के कंधों पर आ गिरी। कई रातें ऐसी थीं जब खुद खाली पेट सोकर भाई को भरपेट खिलाया। कई बार आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर मजबूरी की मुस्कान। स्कूल की फीस से लेकर रोज़ की जरूरतों तक—भानु ने कभी हार नहीं मानी। उसने मेहनत को अपना हथियार और सब्र को अपनी ढाल बना लिया।
आज वही आकाश प्रताप माघ मेले में ‘गोल्डन ब्वॉय’ के नाम से पहचाना जा रहा है। लोग उसकी कहानी सुनते हैं, रुक जाते हैं। कोई सिर झुकाकर सलाम करता है, तो कोई आंखें पोंछता हुआ आगे बढ़ जाता है। आकाश के संघर्ष में हर उस इंसान की झलक दिखती है, जिसने कभी हालात से हार मानने से इनकार किया हो। लेकिन इस कहानी की सबसे भावुक तस्वीर तब बनती है, जब भानु अपने छोटे भाई को देखते हुए मुस्कुराता है। उसकी आंखों में कोई शिकायत नहीं, सिर्फ सुकून है। वह कहता है—“अगर मेरा भाई पढ़-लिखकर अच्छा इंसान बन गया, तो मेरी जिंदगी सफल हो गई।” शायद यही वह पल है, जहां भानु की पूरी तपस्या मुकम्मल होती है।
माघ मेले की भीड़ में आकाश यादव कोई साधारण चेहरा नहीं। वह उन लाखों बच्चों की आवाज है, जो वक्त से पहले बड़े हो गए। वह याद दिलाता है कि मां-बाप सिर्फ जन्म नहीं देते, हालात भी इंसान को गढ़ते हैं। और जब मेले की रोशनी बुझ जाती है, तब भी भानु प्रताप का संघर्ष चमकता रहता है—सोने की तरह नहीं, बल्कि उस भरोसे की तरह, जो कहता है। अगर इरादे मजबूत हों, तो अनाथपन भी हार मान लेता है।
‘गोल्डन ब्वॉय’ नागवासुकी मंदिर के सामने अपना देर जमाए हुए हैं जबकि सिल्वर ब्वॉय संगम तीरे | मेले मे आये पर्यटक दोनों के साथ लगातार सेल्फ़ी ले रहे है |
सिल्वर ब्वॉय रामू मेले में सुर्खियां बटोरते हुए बताया कि उनका सिल्वर बॉय बनने का सफर तीन साल पहले शुरू हुआ था। जिस कारण उन्हें पूणे में खूब पहचान मिली है।
उन्होंने बताया कि बूढ़ी मां, पत्नी और पांच बच्चों की जिम्मेदारी ने रामू को सिल्वर बॉय बनने की राह दिखाई, जो उनकी कमाई का एकमात्र माध्यम है। मेले में लगातार चार से पांच घंटे खड़े होने के बाद रामू की दो सौ से तीन सौ रुपये तक की कमाई हो रही है।
रामू ने बताया कि उन्हें शरीर पर सिल्वर पेंट लगाना पड़ता है जिससे स्किन एलर्जी का सामना करना पड़ता है और उन्हें डॉक्टर से दवा लेनी पड़ती है। सिल्वर बॉय मेले में लोगों से उनकी कला के बदले सिर्फ एक रुपए की मांग रखते हैं।


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