विवाद समाप्त कर समाज को सकारात्मक संदेश दें : हिमांगी सखी
प्रयागराज, (दिनेश तिवारी) हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी, गुजराती और मराठी सहित पांच भाषाओं में भागवत कथा कहने वाली और दुनिया भर में सनातन धर्म का प्रसार करने वाली देश की पहली किन्नर शंकराचार्य हिमांगी सखी ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और आशुतोष ब्रह्मचारी विवाद का पटाक्षेप कर समाज के लिए सकारात्मक करने पर जोर दिया है|
किन्नर शंकराचार्य का कहना है कि शंकराचार्य का पद सनातन धर्म में सर्वोच्च धार्मिक और आध्यात्मिक पद है, जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों का नेतृत्व करता है। ये धर्म के संरक्षक, "जगद्गुरु", और अद्वैत वेदांत के प्रतिनिधि माने जाते हैं, जो बौद्ध धर्म में दलाई लामा या ईसाई धर्म में पोप के समान ही अत्यंत गरिमापूर्ण और निर्णायक स्थान रखते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी शंकराचार्य, साधु , संत और महात्मा को अहंकार , राग, द्वेष से ऊपर होना चाहिए | उसके द्वारा किए गए कार्य समाज के लिए नजीर होते हैं , लोग उन्ही का आचरण करते हैं | इन लोगों को ईश्वर मे लीन होना चाहिए न कि एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का काम करना चाहिए | माघ मेले मे मौनी अमावस्या पर बटुको का सिखा खीचनें कि घटना निंदनीय है| उस घटना कि सभी निंदा करते हैं और उसके पीछे कि कारणों कि जाँच होनी चाहिए, लेकिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य हैं तो उन्हे भी अपनी मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए | वह भी शंकराचार्य निश्चलानंद और अन्य संत महात्माओ कि तरह शांतचित्त स्नान कर लेते तो किसी प्रकार का विवाद ही नहीं होता |
धर्म के नाम पर राजनीति करना उचित नहीं हैं पर धर्म से राजनीति करना उत्तम हैं | धर्म का अर्थ ऐसा जीवन जीना है जिसमें सत्य, अहिंसा, धैर्य, क्षमा, स्वाधीनता, और आध्यात्मिक उन्नति शामिल हो। धर्म का सबसे मूल उद्देश्य इंसान को सही और गलत का बोध कराना, सुख-दुख में धैर्य रखना, दूसरों को दुख न देना, और जीवन में संतुलन बनाए रखना होता है।
इसके विपरीत धर्म को कट्टरता का मार्ग नहीं होना चाहिए, क्योंकि कट्टरता धर्म का बड़ा दुश्मन है। धर्म ऐसा नहीं होना चाहिए जो दूसरों को नुकसान पहुंचाने, भेदभाव करने, खुद को श्रेष्ठ समझने, आडंबर या स्वार्थ के लिए हो। ऐसे मजहब,धर्म से राजनीति दूषित हो जाती हैं, धर्म का असली अर्थ है नैतिकता, सद्भावना, न्याय, और मानवता का मार्ग।.
शंकराचार्य हिमांगी सखी ने कहा कि वह किसी भी विवाद से दूर रहना पसंद करती हैं| उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि किसी पर अंगुली उठाने से पहले दो अंगुलिया स्वतः अपनी ओर उठती हैं| कीचड़ मे पथहर फेंकने पर दुर्गंध के साथ अपना भी दमन दागदार होता है| आशुतोष ब्रह्मचारी भी अपने को महात्मा, साधु कि श्रेणी मे मानते हैं तो उन्हे भी किसी विवाद मे पड़ने से बचना चाहिए और ईश्वर मे ध्यान लगाना चाहिए | ये सभी समाज को निस्वार्थ भाव से सही दिशा में ले जाने और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाने के लिए समर्पित होते हैं। | इस विवाद से समाज का भला तो नहीं होगा बल्कि समाज मे संत, महात्मा ,साधु और शंकराचार्य के सम्मान पर ग्रहण लगने का काम करेगा |
उन्होंने कहा कि संत, महात्मा, साधु और शंकराचार्य भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के स्तंभ हैं। इनका मुख्य दायित्व सनातन धर्म की रक्षा, वेदांत ज्ञान का प्रचार-प्रसार, समाज को सत्कर्म (अच्छे कर्म) की प्रेरणा देना और मानवता की सेवा करना है। ये समाज का मार्गदर्शन करते हैं और त्याग व वैराग्य से ईश्वर भक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
वह इन दोनों श्रेष्ठ जनों को कुछ नहीं कहती हैं, वो चाहती हैं कि समाज मे साधु, संत, महात्माओं और शंकराचार्य कि गरिमा पर आंच नहीं आए | किसी प्रकार का अहंकार विनाश का कारक होता है | इससे बचने का प्रयास किया जाना चाहिए| संत, महात्मा और शंकराचार्य का काम अदालतों के चक्कर लगाने का काम नहीं है | इनका काम समाज का मार्गदर्शन करना है और त्याग व वैराग्य से ईश्वर भक्ति का मार्ग दिखाना है|
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