गौरैया की फिर सुनाई देगी चहचहाहट, दाना.पानी और घोंसलों से बना अनुकूल माहौल


प्रयागराज, ( दिनेश तिवारी)  पर्यावरण प्रेमियों और विशेषज्ञों के मुताबिक सामूहिक प्रयासों से कभी आंगन और छत की पहचान रही गौरैया अब धीरे.धीरे फिर लौटती नजर आ रही है।

हालांकि गिनती न होने के कारण कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन, सुधार की बात हर कोई मान रहा है। लोग मानते हैं कि चिड़िया के रूप में पूर्वज आकर घर.परिवार का हाल.चाल लेते हैं। साथ ही सुबह.सुबह गौरैया की चहचहाहट को शुभ माना जाता है।

बीते कुछ वर्षों में शहरीकरण, पेड़ों की कटाई और बदलती जीवनशैली के कारण गौरैया लगभग लुप्त सी हो गई थी। कंक्रीट के जंगल में उसे घोंसला बनाने की जगह नहीं मिल रही थी और कीटनाशकों के कारण उसका भोजन भी कम हो गया था। अब हालात बदलते दिख रहे हैं। गांवों के साथ शहरों में भी लोग अपने घरों की बालकनी और छत पर दाना पानी रखने लगे हैं। साथ ही कृत्रिम घोंसले (नेस्ट बॉक्स) लगाने की पहल भी बढ़ी है। बढ़ते शहरीकरण, प्रदूषण, और मोबाइल टावरों से निकलते रेडिएशन के कारण लुप्त हो रही गौरैया की आबादी को बचाना है|

पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि जहां हरियाली और पानी की उपलब्धता बढ़ी है , वहां गौरैया की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। यह सकारात्मक संकेत है। मान्यता है कि यदि घर में गौरैया का घोंसला बनाती है तो यह लक्ष्मी के आगमन और घर में सुख.शांति का संकेत होता है। ऐसे घर को समृद्ध और सुरक्षित माना जाता है। कुछ जगहों पर गौरैया को पितरों का प्रतीक माना जाता है।

पुरानी झूसी निवासी भोला सिंह बताते हैं कि बढ़ते शहरीकरण और प्रदूषण के कारण तेजी से विलुप्त हो रही गौरैया  के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है। उन्होंने कहा कि 20 मार्च को  “विश्व गौरया दिवस “ पर  नन्हीं गौरैया और अन्य छोटे पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास, दाना-पानी उपलब्ध कराने का संकल्प लेने और उनके प्रति संवेदनशीलता जगाने का अवसर है। श्री सिंह ने कहा कि बढ़ते शहरीकरण, प्रदूषण, और मोबाइल टावरों से निकलते रेडिएशन के कारण लुप्त हो रही गौरैया की आबादी को बचाना है|

उन्होंने बताया कि लोगों में बढ़ती जागरूकता और दाना.पानी रखने की पहल से गौरैया की वापसी संभव हो रही है। बाजार में बढ़ी घोंसलों की मांग बढ़ी है | अंदावा स्थित कुसा होम डेकोर शॉप चलाने वाले कुमार शांतनु सिंह ने बताया कि गौरैया के लिए रेडीमेड घोंसले आमतौर पर 250 से 500 रुपये तक में उपलब्ध हैं। लोगों में जागरूकता बढ़ाने के साथ उनकी मांग भी तेजी से बढ़ी है। घरों और बालकनी में इन्हें लगाने का चलन बढ़ रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ता रोशन पांडे ने बताया कि फेसबुक, एक्स और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर लोग अपने घरों में दाना.पानी रखने, घोंसले लगाने और गौरैया से जुड़ी तस्वीरें साझा करते हैं। इन्हें देखकर दूसरे लोग भी प्रेरित होते हैं और इस मुहिम से जुड़े हैं। यही वजह है कि हर साल इस दिन बड़ी संख्या में लोग गौरैया को बचाने के लिए आगे आते हैं। उन्होंने बताया कि इसके अलावा गौरैया को बचाने के लिए उनके खाने पीने व रहने के लिए बॉक्स बनवा कर घरों की छत व मुंडेर पर स्थापित करने की जरूरत है। गौरैया पर्यावरण के साथ हमारी फसलों के लिए भी लाभदायक हैए क्योंकि ये फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े.मकोड़ों को चुन कर खा कर जाती हैं।

उन्होंने बताया कि गाँवों के शांत सुबह से लेकर शहरों की चहल-पहल तक, गौरैया कभी हवा को अपनी खुशनुमा चहचहाहट से भर देती थीं। इन नन्हें पक्षियों के झुंड, बिन बुलाए मेहमान होने के बावजूद स्वागत योग्य, अविस्मरणीय यादें बनाते थे। लेकिन समय के साथ, ये नन्हें दोस्त हमारी जिंदगी से गायब हो गए हैं। कभी बहुतायत में पाई जाने वाली घरेलू गौरैया अब कई जगहों पर एक दुर्लभ दृश्य और रहस्य बन गई है। इन छोटे प्राणियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उनकी रक्षा करने के लिए, हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।

भारत में गौरैया सिर्फ़ पक्षी नहीं हैं; वे साझा इतिहास और संस्कृति का प्रतीक हैं। हिंदी में "गौरैया" , तमिल में "कुरुवी" और उर्दू में "चिरिया" जैसे कई नामों से जानी जाने वाली गौरैया पीढ़ियों से दैनिक जीवन का हिस्सा रही हैं। वे अपने खुशनुमा गीतों से हवा को भर देती थीं, खासकर गांवों में, जिससे कई लोगों की यादें जुड़ी हुई थीं।

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