महंगाई के दौर में दो और पांच रुपये में ज्ञान बांट रही गीता प्रेस


उदय प्रकाश पांडे से

गोरखपुर, 15 मई (वार्ता) ऐसे समय में जब सामान्य उपयोग की वस्तुओं की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, गोरखपुर स्थित गीता प्रेस आज भी मात्र दो और पांच रुपये जैसी न्यूनतम कीमत पर धार्मिक और नैतिक साहित्य उपलब्ध कराकर दुनिया भर में एक अनोखी मिसाल पेश कर रही है।

नीति, धर्म, अध्यात्म और नैतिक मूल्यों पर आधारित पुस्तकों को लागत से भी कम मूल्य पर उपलब्ध कराने वाली यह संस्था पिछले कई दशकों से लोककल्याण की भावना के साथ कार्य कर रही है।
रेती रोड स्थित गीता प्रेस की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि संस्था अपने संचालन के लिए किसी प्रकार का चंदा या बाहरी आर्थिक सहायता स्वीकार नहीं करती। विश्व प्रसिद्ध ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ आज भी यहां मात्र पांच रुपये की टोकन राशि पर उपलब्ध है, जिसे जीवन प्रबंधन और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।
घनी आबादी के बीच स्थापित गीता प्रेस अपनी विशिष्ट कार्यशैली और प्रकाशन गुणवत्ता के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। यहां दो इंच आकार की लघु पुस्तिकाओं से लेकर बड़े और भव्य ग्रंथों तक का नियमित प्रकाशन किया जाता है। समय के साथ संस्था ने आधुनिक तकनीक को भी अपनाया है और वर्तमान में अत्याधुनिक कंप्यूटर तकनीक तथा हाई-स्पीड मशीनों के माध्यम से बड़े पैमाने पर प्रकाशन कार्य किया जा रहा है।
19वीं शताब्दी के तीसरे दशक में कोलकाता से छोटे स्तर पर शुरू हुई यह यात्रा आज एक विशाल संस्थान का रूप ले चुकी है। गीता प्रेस के संस्थापक जयदयाल गोयन्दका ने वर्ष 1923 में हिंदी अनुवाद के साथ ‘गीता’ का प्रकाशन शुरू किया था। वर्तमान में यह ग्रंथ हिंदी और संस्कृत के अलावा बांग्ला, मराठी, गुजराती, मलयालम, पंजाबी, तमिल, कन्नड़, असमिया, ओड़िया, उर्दू, अंग्रेजी और नेपाली समेत 15 भाषाओं में प्रकाशित हो रहा है।
गीता प्रेस के प्रकाशन प्रबंधक डॉ. लालमणि तिवारी ने ‘यूनीवार्ता’ को बताया कि संस्था की सफलता के पीछे तीन प्रमुख आधार अत्यंत कम मूल्य, छपाई की शुद्धता और पाठ की प्रामाणिकता है। उन्होंने बताया कि अब तक गीता प्रेस से लगभग 103 करोड़ पुस्तकें प्रकाशित होकर पाठकों तक पहुंच चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि गीता प्रेस किसी विशेष ऑर्डर पर छपाई नहीं करता, बल्कि मांग का अनुमान लगाकर पहले से ही पुस्तकों का पर्याप्त स्टॉक तैयार रखा जाता है।
संस्था की सादगी और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता का उदाहरण हाल ही में देखने को मिला, जब भारत सरकार द्वारा प्रदान किए गए ‘गांधी शांति पुरस्कार’ के साथ घोषित एक करोड़ रुपये की सम्मान राशि को संस्था ने विनम्रतापूर्वक स्वीकार करने से इंकार कर दिया। संस्था अपने मूल सिद्धांतों के तहत किसी प्रकार का दान या आर्थिक सहयोग नहीं लेती।
उत्पादन क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से गोरखपुर के गीडा क्षेत्र में 10 एकड़ भूमि पर नए प्लांट का निर्माण कार्य भी जारी है। यहां जर्मनी, जापान और इटली की आधुनिक मशीनों के माध्यम से प्रकाशन कार्य को और विस्तारित किया जाएगा।
आध्यात्मिक जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका .कल्याण. ने अपने प्रकाशन के 100 गौरवशाली वर्ष पूरे कर लिए हैं। 1926 में मुंबई से शुरू हुई इस पत्रिका का संपादन प्रसिद्ध समाजसेवी भाईजी श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार ने किया था। हाल ही में इसके शताब्दी अंक (विशेषांक) का विमोचन ऋषिकेश में गृह मंत्री अमित शाह द्वारा किया गया, जिसमें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और योग गुरु स्वामी रामदेव सहित कई विभूतियाँ शामिल रहीं।
गीता प्रेस की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके शताब्दी वर्ष समारोह के शुभारंभ में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और समापन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत की थी।
प्रेस के भीतर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय रहता है। यहाँ स्थापना काल से ही एक अनूठी परंपरा है एक स्थायी कर्मचारी हाथ में ‘हरे राम-हरे कृष्ण’ महामंत्र की तख्ती लेकर पूरे परिसर में घूमता रहता है। उसे देखते ही ट्रस्टी से लेकर कर्मचारी तक मंत्र का जाप करते हैं। साथ ही, कार्य शुरू होने से पहले सभी कर्मचारी 15 मिनट तक सामूहिक प्रार्थना और नारायण धुन में शामिल होते हैं।
प्रेस के प्रबंधक बैजनाथ अग्रवाल के अनुसार, “ हमारा प्रयास है कि लोगों का आचरण शुद्ध बना रहे। यदि ईश्वर का स्मरण रहेगा, तो समाज में ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता आएगी। यही गीता प्रेस की स्थापना का मूल उद्देश्य है।”

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सपा अध्यक्ष को लगता है कि मुसलमान उनकी जेब में हैं: मायावती

हार-जीत से बड़ा है सक्षम बनना

24 जुलाई 2026 को चंद्रमा दिखाई देगा अन्टारेस (ज्येष्ठा नक्षत्र के योगतारा) के पास