आरोपियों के रिश्तेदारों को परेशान नहीं कर सकती पुलिस : उच्च न्यायालय
प्रयागराज, (दिनेश तिवारी) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश मे कहा कि पुलिस द्वारा किसी आरोपी के रिश्तेदारों को प्रताड़ित करना या परेशान करना एक “ औपनिवेशिक प्रथा” है , जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरंटीकृत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है |
न्यायमूर्ति जे जे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने कहा कि आज के समय मे पुलिस के पास आरोपी का पता लगाने और उसे न्याय के कटघरे मे लाने के लिए वैज्ञानिक तरीके मौजूद है, न कि उसके रिश्तेदारों को डराना धमकाना |
खंडपीठ ने ये टिप्पडियाँ एक दंपति (मुनिता देवी और अन्य) द्वारा दायर आपराधिक याचिका कि सुनवाई करते हुए कहा कि , जिसमे उन्होंने प्रयागराज पुलिस द्वारा लगातार उत्पीड़न किए जाने का आरोप लगाया था | यह उत्पीड़न कथित तौर पर उनके बेटे के खिलाफ दर्ज एक एफआईआर के कारण हो रहा है | खंडपीठ को बताया गया कि फरार दम्पत्ति पता लगाने के लिए, पुलिस याचिककर्ताओं को रोजाना थाने बुलाती है, उन्हे दिनभर बिठाए रखती है और उन्हे केवल शाम को ही जाने दिया जाता है | याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि पुलिसकर्मी उनसे अवैध रूप से पैसे (घूस ) कि मांग कर रहे थे|
खंडपीठ ने कड़ी अपत्ति जताते हुए उपायूक्त , यमुनानगर प्रयागराज और थाना प्रभारी, करछना, यमुनानगर (कमिशनरेट प्रयागराज) को निर्देश दिया कि वे अपने अपने हलफनामे दायर करके बताएं कि किन परिस्थतियों मे याचिकर्ताओं के रोजाना थाने बुलाया जाता रह है |
पीठ ने यह भी जानना चाहा कि क्या याचिकाकर्ताओं कि पुलिस को किस मामले मे तलाश है | अदालत ने इसी यचिक मे पुलिस आयुक्त,प्रयागराज और पुलिस उपायुक्त , यमुनापार , प्रयागराज को भी प्रतिवादी के रूप मे पक्षकार बनाया |
इस बीच , अदालत ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे संबंधित एफआईआर के सिलसिले मे याचिकर्ताओं को किसी भी बहाने से थाने न बुलाएं, न ही उन्हें हिरासत मे लें और नहीं उन्हें किसी तरह कि धमकी दें|

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