तारीख पे तारीख के लिए जज नहीं , बल्कि पुलिस और सरकार जिम्मेदार : उच्च न्यायालय


प्रयागराज, ( दिनेश तिवारी) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज्य की ट्रायल कोर्टों में मुकदमों के अंबार और " तारीख पे तारीख" की समस्या पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला लिया है। 

          न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा है कि आपराधिक मामलों के निस्तारण में होने वाली देरी के लिए न्यायिक अधिकारियों की क्षमता को दोष देना गलत हैए बल्कि इसके लिए मुख्य रूप से राज्य सरकार द्वारा स्टाफ की कमी और पुलिस विभाग की लापरवाही जिम्मेदार है।

      न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि एक स्वतंत्र और पारदर्शी न्यायिक प्रणाली लोकतंत्र की रीढ़ होती हैए लेकिन यदि न्यायपालिका को बुनियादी ढांचे और कर्मचारियों के लिए सरकार की दया पर निर्भर रहना पड़े , तो वह एक संघर्षरत सरकारी विभाग की तरह बनकर रह जाती है। यह कठोर टिप्पणी मेवालाल प्रजापति की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान सामने आई , जिसमें न्यायालय ने पाया कि अदालतों में लंबित मुकदमों की समस्या बहुआयामी है और इसके पीछे प्रशासनिक कमियां हैं।

      न्यायालय ने रेखांकित किया कि ट्रायल अदालतों में पेशकारए आशुलिपिक और अन्य अनुसचिवीय कर्मचारियों की भारी कमी है , जिसके कारण एक.एक क्लर्क हजारों फाइलों का बोझ संभाल रहा है। इसके अलावा , पुलिस की ओर से  अदालती समन और वारंट का समय पर तामील न करना और गवाहोंए विशेषकर पुलिस अधिकारियों का अदालत में पेश न होना देरी का एक बड़ा कारण है।

     न्यायालय ने वर्ष 1993 की प्रसिद्ध फिल्म  " दामिनी " के संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि  तारीख पे तारीख' आम आदमी की धारणा बन चुकी है , लेकिन सच्चाई यह है कि एक न्यायाधीश तब तक मामले का फैसला नहीं कर सकता जब तक पुलिस अभियुक्तों और गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित न करे और समय पर सही फॉरेंसिक रिपोर्ट उपलब्ध न कराई जाए।

    कोर्ट ने यह भी पाया कि फॉरेंसिक लैब  'एफएसएल" की स्थिति दयनीय है , जहां आधुनिक मशीनों और स्टाफ की कमी के कारण रिपोर्ट आने में लंबा समय लगता है। वर्तमान में यूपी की फॉरेंसिक लैब पुलिस विभाग का हिस्सा हैंए जिससे वे प्रशासनिक और वित्तीय रूप से स्वतंत्र नहीं हैं , इसलिए कोर्ट ने इन्हें गृह मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त विभाग बनाने का सुझाव दिया है।

      न्यायालय ने डिजिटल इंडिया के दौर में आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है। अब ई.समन और ई.वारंट भेजने के लिए व्हाट्सएपए टेलीग्राम और ईमेल जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग अनिवार्य किया गया है। साथ हीए पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वे गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए 'स्पीच.टू.टेक्स्ट एआई  ;एआई' मॉड्यूल का उपयोग करें ताकि मैन्युअल रिकॉर्डिंग में लगने वाला समय कम हो सके।

    कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जिला पुलिस प्रमुखों और कमिश्नरों को जिला जज की अध्यक्षता वाली मॉनिटरिंग सेल की बैठकों में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगाए क्योंकि उनकी अनुपस्थिति न्यायिक प्रोटोकॉल का अपमान है। अंत में न्यायालय ने पंजाब और हरियाणा की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों को निजी सुरक्षा अधिकारी  'पीएसओ ' प्रदान करने की व्यवहार्यता पर विचार करने का निर्देश दिया है , ताकि वे बिना किसी भय या दबाव के न्याय कर सकें। इस आदेश की एक प्रति मुख्यमंत्री के अवलोकन के लिए भी भेजने का निर्देश दिया गया है ताकि प्रशासनिक स्तर पर इन सुधारों को गति मिल सके। जहां तक मूल मामले की बात हैए न्यायालय ने साक्ष्यों की गंभीरता और अपराध की प्रकृति को देखते हुए आरोपी की जमानत अर्जी को फिलहाल खारिज कर दिया है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सपा अध्यक्ष को लगता है कि मुसलमान उनकी जेब में हैं: मायावती

हार-जीत से बड़ा है सक्षम बनना

24 जुलाई 2026 को चंद्रमा दिखाई देगा अन्टारेस (ज्येष्ठा नक्षत्र के योगतारा) के पास