डिजिटल युग में बढ़ता एकाकिपन
सचमुच 'डिजिटल क्रांति' बदल डाली जीवन की है रफ्तार।
आज इतिहास अनोखे दौर से गुजरा, प्रगति के है आसार।
मानव एक ऐसे युग में जी रहा, भौगोलिक दूरियां सिमटी हैं।
दुनिया एक वैश्विक गाँव में तब्दील हुई, अद्भुत है चमत्कार।
उंगलियों के स्पर्श मात्र से, जानकारी ए आई मिडिया की।
मनोरंजन - सुविधा हाजिर, नहीं जरुरत बाहर जाने की।
नेट- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस - सोशल मीडिया भारी।
गतिशीलता अभूतपूर्व रूपेण बढ़ी, जीवन सजाने की।
पर तकनीकी चकाचौंध मध्य गंभीर विचारणीय प्रश्न है।
क्या इस डिजिटल क्रांति ने हमें सचमुच करीब- ज़श्न है।
या फिर अपने ही समाज- परिवार से विमुख हुए दुःखद।
सामाजिक ताना-बाना बुनियादी सोच झकझोरे रश्क है।
तकनीकी प्रगति के बावजूद बढ़ा, सामाजिक गह अलगाव।
तकनीकी प्रगति नि:संदेह हमें सशक्त बनाया यह बदलाव।
शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और व्यापार के क्षेत्र में गति आई।
उसकी कल्पना दो दशक पूर्व असंभव, अद्भुत यह प्रभाव।
वीडियो कॉलिंग से सात समंदर पार बैठे अपनों को देखें।
उनसे बात करना अब रोजमर्रा की बात, आउडियो देखें।
विडंबना कि जो तकनीक मीलों दूर बैठे अपनों से जोड़े।
वही बगल में बैठे हुओं से दूर कर, एक दूजे को नहीं देखें।
एक ही घर, लिविंग रूम में, अपने-अपने स्क्रीन में खोए।
यह दृश्य आज की सबसे बड़ी सामाजिक विडंबना होए।
आभासी दुनिया में जुड़े पर वास्तिकता में अलग- थलग।
सोशल मीडिया पर कई मित्र, पर सच्चे सहारे कैसे होए।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत सामूहिकता है।
संयुक्त परिवार और आपसी भाईचारे की भावुकता है।
सुख-दुख में सारा मोहल्ला, गांव एक साथ खड़ा होता।
त्योहारों की रौनक घर तक न सीमित, समाजिकता है।
अब सामूहिकता का स्थान व्यक्तिवाद, एकाकीपन आया।
शहरों की बहुमंजिला इमारतों के रहनुमा परिचय न पाया।
यह भी पता नहीं होता, पड़ोसी के घर में क्या चल रहा है।
डिजिटल अकेलेपन ने मानसिक विकृति को जन्म दिया।
अवसाद, एंग्जायटी व अकेलेपन के मामले त्वरित बढ़े हैं।
इनमें सबसे बड़ी संख्या युवावर्ग तकनीक के सन्निकट हैं।
सोशल मीडिया संवाद का बदला स्वरूप आज के दौर में।
संवाद एवम् सूचना के बीच का अन्तर धुमिल हो चुके हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सूचनाओं की बाढ़ आई है।
सार्थक संवाद लगातार कम हो रहे, मन की बात दबाई है।
लोग अपनी बात दूसरों तक पहुँचाना चाहते, पर मजबूर।
लेकिन दूसरों को सुनने एवं समझने का धैर्य खो चुका है।
गंभीर मुद्दे पे बहस की जगह उग्र प्रतिक्रियाओं ने ले ली है।
ग़ौरतलब तकनीक की दुनिया साकारात्मकता सिखाती है।
जो हम देखना चाहते हैं, जिससे हमारे विचार संकीर्ण हुए।
समाज में वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ा, सहानुभूति सवाली है।
निष्कर्ष यही प्रगति तभी सार्थक है जब समाज जुड़ा रहे।
अंततः "डिजिटल क्रांति" मानव सभ्यता हेतु वरदान रहे।
बशर्ते हम इसके मालिक बने रहें, इसके गुलाम नहीं बनें।
संस्कृति व संवाद से आभासी चमक-दमक बरकरार रहे।
सुसंस्कार खोकर भी पीढ़ियाँ समृद्ध सभ्यता याद करेगी।
उनके पास सब पर एक-दूसरे का साथ नहीं, बात करेगी।
समय आ गया है कि हम अपनी स्क्रीन से नजरें हटा देखें।
सामने बैठे इंसान की आँखों में देखें, स्वस्थ्यलाभ करेगी।
जीवंत एवं संवेदनशील समाज के निर्माण में योगदान हो।
सार्थक प्रगति समाज को जोड़े, नकि उसे बिखेर सीमा हो।
संवेदनशीलता, किसी भी स्वस्थ समाज के प्राण होती है।
बच्चे की शामें खेल मैदानों में बीतें, मोबाइल का समय हो।।
डॉ. कवि कुमार निर्मल
बेतिया नगर निगम
पश्चिम चंपारण (बिहार)
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