तीन तलाक जैसे रस्म.रिवाज अंतरात्मा को झकझोरने वाले काले पन्ने
प्रयागराज, ( दिनेश तिवारी ) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि निकाह , हलाला और तीन तलाक जैसे रस्म.रिवाजों के चक्रव्यूह में फंसा कर महिला के यौन शोषण की इजाजत नहीं दी जा सकती।
यह हमारे समाज का वह काला पन्ना है, जो संवैधानिक मूल्यों , समानता और मानवीय गरिमा की अवधारणा से कोसों दूर है। ये कृत्य न केवल कानूनन अपराध हैंए बल्कि ये समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोरने वाले हैं।
. न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने पीड़िता के पूर्व पति , चाचा , मौलाना समेत अन्य रिश्तेदारों की याचिका खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत कानूनों की आड़ में अपराधों का संरक्षण नहीं किया जा सकता। प्रथम दृष्टया यह मामला नाबालिग संग सोची समझी रणनीति के साथ सामूहिक दुष्कर्म का है। इसकी गहन जांच जरूरी है।
मामला अमरोहा के सैदनागली थाना क्षेत्र का है। एफआईआर के मुताबिक पीड़िता का निकाह 2015 में तब हुआ था जब वह महज 15 वर्ष की थी। इसके बाद तीन तलाक, फिर निकाह हलाला और पुनः निकाह के चक्रव्यूह में फंसाकर उसका लगातार यौन शोषण किया गया। पीड़िता का आरोप है कि 19 फरवरी 2025 को फिर से निकाह का झांसा देकर उसे हलाला के नाम पर दरिंदगी का शिकार बनाया गया। व्यक्तिगत कानूनों और धार्मिक प्रथाओं का हवाला देते हुए आरोपियों ने अलग.अलग चार याचिकाएं दाखिल कर मुकदमा रद्द करने व गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की। लेकिन कोर्ट ने तल्ख टिप्पणियों संग याचिका खारिज कर दी।
याचियों के अधिवक्ता ने दलील दी कि 2016 में तीन तलाक ( तलाक.ए.बिद्दत) शरिया कानून के तहत मान्य था। इस्लामी कानून के अनुसार निकाह हलाला एक वैध रस्म है। पीड़िता ने आपसी सहमति से तलाक की डिक्री ली थीए जिसमें उसने अपनी उम्र 24 वर्ष बताई थी , लिहाजा , वह निकाह के समय वह वयस्क थी। एफआईआर केवल पूर्व पति के साथ चल रहे बच्चे की कस्टडी और संपत्ति विवाद के कारण उसे और उसके परिजनों को फंसाने के लिए दर्ज कराई गई है। अभियोजन ने कहा कि याचियों पर नाबालिग संग सामूहिक दुष्कर्म का आरोप है। इसकी गहन जांच की आवश्यकता है। यह एक महिला के साथ.साथ समाज और मानवता के खिलाफ भी अपराध है।
आदेश के अंत में कोर्ट ने कहा कि अब तक जो भी तथ्य सामने आए हैं , वे अंतरात्मा को झकझोर देने वाले हैं। यहां सभी आरोपियों ने ऐसे गिरोह के रूप में जो भूमिका निभाई, वह प्रथम दृष्टया देश के कानूनों के खिलाफ है। कुछ की भूमिका सहायक या षड्यंत्रकारी के रूप में हो सकती है , लेकिन विवेचना के इस प्रारंभिक स्तर पर उन्हें एफआईआर रद्द कराने की मांग करने का हक नहीं है।
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