कचरे के पहाड़ से ईको पार्क तक: गोरखपुर में 40 एकड़ डंपसाइट बनी ‘राप्ती ईको पार्क’
गोरखपुर, 4 अगस्त (वार्ता) स्वच्छ भारत मिशन (अर्बन) के तहत उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर निगम ने वर्षों पुराने लेगेसी वेस्ट डंपसाइट का वैज्ञानिक निस्तारण कर उसे 40 एकड़ में फैले आधुनिक ‘कचरे से कंचन राप्ती ईको पार्क’ में बदल दिया है। यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण, भूमि पुनरुद्धार और सतत शहरी विकास का एक सफल उदाहरण बनकर उभरी है।आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह डंपसाइट करीब सात वर्षों तक शहर के ठोस कचरे का प्रमुख निस्तारण स्थल रही, जहां लाखों टन कचरा जमा होने से विशाल कचरे का पहाड़ बन गया था। इसके कारण आसपास के क्षेत्र में दुर्गंध, धुआं, लीचेट का रिसाव, मच्छरों का प्रकोप, भूजल एवं मिट्टी प्रदूषण और वायु गुणवत्ता में गिरावट जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो गई थीं। तेज हवाओं में कचरा आसपास के घरों तक पहुंच जाता था और स्थानीय लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा था।
नगर निगम ने इस चुनौती से निपटने के लिए बायोमाइनिंग तकनीक अपनाई। आठ ट्रॉमल मशीनों, जेसीबी और लगभग 25 कर्मियों की सहायता से प्रतिदिन करीब 400 टन कचरे का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण किया गया। कचरे को रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल (आरडीएफ), ब्लैक सॉइल, पुनर्चक्रण योग्य सामग्री और इनर्ट सामग्री जैसी श्रेणियों में अलग किया गया। ब्लैक सॉइल का उपयोग भूमि समतलीकरण में किया गया, जबकि आरडीएफ को सीमेंट उद्योग में उपयोग के लिए भेजा गया।
इस प्रक्रिया से 40 एकड़ भूमि को पुनः उपयोग योग्य बनाया गया। साथ ही मीथेन गैस के उत्सर्जन में कमी आई तथा मिट्टी और भूजल प्रदूषण का खतरा भी घटा। क्षेत्र में व्यापक वृक्षारोपण किया गया, जिससे हरित क्षेत्र विकसित हुआ और जैव विविधता में वृद्धि दर्ज की गई। यहां अब विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां, मधुमक्खियां और तितलियों की संख्या भी बढ़ी है।
भूमि के पुनरुद्धार के बाद नगर निगम ने यहां ‘राप्ती ईको पार्क’ विकसित किया, ताकि इस स्थान का उपयोग जनहित में हो और भविष्य में यहां दोबारा कचरा न डाला जाए। पार्क की विशेषता यह है कि यहां कई कलात्मक संरचनाएं नगर निगम की कार्यशाला से निकले अपशिष्ट पदार्थों से तैयार की गई हैं, जो ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा को प्रदर्शित करती हैं।
पार्क में ग्रीन लॉन, वॉकिंग एवं जॉगिंग ट्रैक, बच्चों के लिए किड्स जोन, ओपन जिम, योग एवं मेडिटेशन क्षेत्र, सेल्फी प्वाइंट, जल संरक्षण संरचनाएं, सोलर लाइटिंग, थीम आधारित उद्यान, आधुनिक बैठने की व्यवस्था, फूड कोर्ट, कियोस्क, पार्किंग और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं विकसित की गई हैं। यहां संचालित रेस्टोरेंट का संचालन महिला स्वयं सहायता समूह ‘शक्ति की रसोई’ द्वारा किया जा रहा है, जिससे स्थानीय महिलाओं को रोजगार और आजीविका के अवसर भी मिले हैं।
नगर निगम के अनुसार पार्क में प्रतिदिन लगभग 500 लोग सुबह और शाम सैर, व्यायाम और मनोरंजन के लिए पहुंच रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि डंपसाइट हटने से क्षेत्र का वातावरण स्वच्छ हुआ है, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं कम हुई हैं और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आया है।
नगर निगम और स्वयं सहायता समूहों के सहयोग से संचालित यह परियोजना आसपास के क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दे रही है। बेहतर सड़क संपर्क और सार्वजनिक सुविधाओं के कारण स्थानीय व्यापार को गति मिली है तथा भविष्य में रोजगार के नए अवसर विकसित होने की संभावना बढ़ी है। यह पहल स्वच्छ भारत मिशन के तहत लेगेसी वेस्ट मुक्त, स्वच्छ और सतत शहरों के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

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