हिरासत में आरोपी को मारना.पीटना पुलिस की ड्यूटी का हिस्सा नहीं: उच्च न्यायालय
प्रयागराज,(दिनेश तिवारी) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी आरोपी को हिरासत में बांध कर पीटना पुलिस के आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं हो सकता है। यह एक गंभीर अपराध है, जिसे ड्यूटी के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता है।
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने यह टिप्पड़ी करते हुए हिरासत में आरोपी को मारने.पीटने के मामले में पुलिसकर्मियों की याचिका खारिज कर दी है।
बांदा जिले के बबेरू थाना क्षेत्र में मई 2022 में एक मुकदमे की जांच के दौरान पुलिस नोटिस देने गई थी। आरोप है कि आरोपी पक्ष ने पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की और उनके सरकारी कागजात व नोटिस फाड़ दिए। इसके बाद पुलिस ने गांव के चार लोगों को हिरासत में ले लिया , जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं। परिवार वालों ने पुलिस पर केस दर्ज कराया कि पुलिस ने शिकायतकर्ता और उसके परिवार के हाथ.पैर बांधकर उनके कूल्हे, जांघ, छाती और शरीर के अन्य हिस्सों में चोट और सूजन आई , जिसकी पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट में भी हुई। छेड़छाड़ और लूटपाट के भी आरोप लगे।
मामले में आरोपपत्र दाखिल किया गया। आरोपी पुलिसकर्मियों ने ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज एप्लीकेशन उन्मोचन प्रार्थना पत्र दाखिल किया। तर्क था कि घटना ड्यूटी निभाने के दौरान हुई है , इसलिए उन पर मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत सक्षम प्राधिकारी से मंजूरी लेना जरूरी है। ट्रायल कोर्ट ने यह तर्क मानने से इनकार कर दिया।
उच्च न्यायालय ने हिरासत में आरोपी को मारने.पीटने के मामले में पुलिसकर्मियों की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि हिरासत में किसी व्यक्ति को बांध कर बार.बार पीटना, ड्यूटी के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता। किसी व्यक्ति को हिरासत में लेना , उसके हाथ.पैर बांध कर पीटना पुलिस के आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं हो सकता है। यह एक गंभीर अपराध है।
रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी पुलिसकर्मियों ने पहले भी संज्ञान व समन आदेश को चुनौती देते हुए न्यायालय का रुख किया था, लेकिन आठ फरवरी, 2024 को सक्षम अदालत के समक्ष पेश होने और जमानत अर्जी दाखिल करने की अनुमति लेकर उन्होंने वह याचिका वापस ले ली थी।
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