नौकरी के तथ्य को छिपाकर भरण -पोषण मांगने वाली फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द: उच्च न्यायालय


प्रयागराज, (दिनेश तिवारी) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बागपत की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पत्नी को हर महीने 5 हजार रुपए भरण.पोषण देने का आदेश दिया गया था। 

          न्यायालय ने पाया कि पत्नी नौकरी कर रही थी और अपनी नौकरी व आय से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य अदालत के सामने स्पष्ट नहीं किए थे।

           न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने मनोज कुमार राना की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का 6 सितंबर 2024 का आदेश रद्द कर दिया।

          मनोज कुमार राना की शादी 15 मार्च 2021 को प्रिती उर्फ प्रीति पुंडीर से हिंदू रीति.रिवाज से हुई थी। पत्नी ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत पति से हर महीने 20 हजार रुपए भरण.पोषण की मांग की थी।

         बागपत की प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट ने 6 सितंबर 2024 को पत्नी को हर महीने 5 हजार रुपए गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। पति ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

        पति का कहना था कि पत्नी नोएडा की निम्बस एडकॉम प्राइवेट लिमिटेड में सेल्स मैनेजर के पद पर काम करती है और करीब 40 हजार रुपए महीने कमाती है। पति ने यह भी दावा किया कि कोविड लॉकडाउन के दौरान उसकी नौकरी चली गई थी और वह बेरोजगार है।

           पत्नी ने पति और ससुराल पक्ष पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाया। उसका कहना था कि शादी में करीब 10 लाख रुपए खर्च हुए थेए लेकिन ससुराल पक्ष कम दहेज मिलने से नाखुश था।

          नौकरी के संबंध में पत्नी ने बताया कि वह 2017 से 2022 तक नौकरी में थी और 30 जून 2022 को उसने इस्तीफा दे दिया था। इसके समर्थन में उसने कंपनी का 1 जुलाई 2022 का रिलिविंग लेटर भी अदालत में पेश किया।

             ट्रायल कोर्ट में पत्नी ने कहा था कि शादी के करीब 5.6 महीने बाद उसने नौकरी छोड़ दी थी। जबकि उसके ही रिलिविंग लेटर के मुताबिक वह 30 जून 2022 तक नौकरी करती रही। जिरह के दौरान पत्नी ने यह भी कहा कि उसने नौकरी छोड़ी थीए लेकिन इस्तीफा नहीं दिया। साथ ही उसने इस्तीफे से जुड़े पत्र पर अपने हस्ताक्षर होने से भी इनकार किया।

          पति की ओर से अदालत में कंपनी से जुड़े कुछ दस्तावेज भी पेश किए गए। इनमें 20 नवंबर 2022 को कंपनी की ओर से जन्मदिन की शुभकामनाएं और 16 अगस्त 2025 को कंपनी के 8 वर्ष पूरे होने पर जारी बधाई पत्र शामिल था।

            उच्च न्यायालय ने इन दस्तावेजों को देखते हुए कहा कि रिकॉर्ड से यह संकेत मिलता है कि पत्नी इस्तीफे की बताई गई तारीख के बाद भी कंपनी में सेल्स मैनेजर के रूप में काम कर रही थी। रिकॉर्ड में पत्नी का 13 नवंबर 2021 का एक पत्र भी सामने आया। इसमें उसने कहा था कि वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती और तलाक चाहती है। न्यायालय ने मामले के

रिकॉर्ड में पत्नी का 13 नवंबर 2021 का एक पत्र भी सामने आया। इसमें उसने कहा था कि वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती और तलाक चाहती है। न्यायालय ने मामले के सभी तथ्यों और दस्तावेजों को एक साथ देखते हुए पत्नी के दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।

              उच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायालय के सामने आने वाले पक्षकार को साफ नीयत और पूरे तथ्यों के साथ आना चाहिए। यदि कोई पक्षकार महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है तो उसकी याचिका पर राहत देने के लिए अदालत को सावधानी से विचार करना होता है।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी ने अपनी नौकरी और आय से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य ट्रायल कोर्ट के साथ.साथ उच्च न्यायालय के समक्ष भी सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किए।

               उच्च न्यायालय ने माना कि ऐसे तथ्यों के आधार पर पत्नी पति से भरण.पोषण की हकदार नहीं है। कोर्ट ने बागपत फैमिली कोर्ट का 6 सितंबर 2024 का आदेश रद्द कर दिया और मनोज कुमार राना की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली।

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