अदालती कार्यवाही के वीडियो के अनधिकृत प्रसार को रोकने के उपाय, नीति में शामिल हों: उच्चतम न्यायालय


 नयी दिल्ली, 30 अक्टूबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि लाइव-स्ट्रीम की जाने वाली अदालती कार्यवाहियों के अनधिकृत प्रसार को रोकने के उपाय केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की प्रस्तावित नीति का हिस्सा होने चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि मंत्रालय प्रस्तावित नीति को अंतिम रूप देने और लागू करने के बाद अदालती कार्यवाही के वीडियो के अनधिकृत उपयोग और प्रसार के परिणामों (सजा/कार्रवाई) को भी स्पष्ट रूप से दिखाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने निर्देश दिया कि अदालत के कक्ष के वीडियो के दुरूपयोग या उससे पैसे कमाने के खिलाफ उसके 24 जुलाई के अंतरिम निर्देशों के उल्लंघन के परिणामों को भी प्रस्तावित नीतिगत ढांचे में शामिल किया जाए।

उच्चतम न्यायालय ने सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर न्यायिक कार्यवाहियों के वीडियो दुरूपयोग के खिलाफ सुरक्षा उपायों की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर एक नीति पर विचार कर रही है और उसे उच्च न्यायालयों, वकीलों तथा अन्य हितधारकों से सुझाव प्राप्त हुए हैं। उन्होंने यह भी सूचित किया कि उसके पिछले निर्देशों के उल्लंघन के मामले सामने आए हैं और मंत्रालय स्तर पर इस मामले पर विचार किया जा रहा है।

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने डिजिटल वॉटरमार्क और क्रिप्टोग्राफिक प्रमाणीकरण के उपयोग का सुझाव दिया ताकि आधिकारिक फुटेज को हेरफेर किए गए या अनधिकृत क्लिप से अलग पहचाना जा सके।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर भी सुरक्षा उपायों पर विचार किया जा रहा है और उन्होंने उल्लेख किया कि कुछ उच्च न्यायालयों ने आधिकारिक लाइव-स्ट्रीम फीड से फुटेज के दुरूपयोग को रोकने के लिए पहले ही कदम उठाए हैं।

पीठ ने इस बात को भी दोहराया कि प्रमाणित अदालती फुटेज का भी व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा सकता और संकेत दिया कि अदालती वीडियो फुटेज के गलत इस्तेमाल पर कुछ हद तक न्यायिक पर्यवेक्षण आवश्यक रहेगा।

हालांकि, श्री प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि पत्रकारों, यूट्यूबरों और कानूनी विश्लेषकों को खुले न्याय के सिद्धांत के आधार पर पूर्व अनुमति लिए बिना रिपोर्टिंग के लिए प्रमाणित फुटेज के अंशों का उपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए। न्यायालय ने कहा कि इन चिंताओं की जांच उचित चरण में की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि जुलाई में उच्चतम न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश के जरिए अदालत की कार्यवाहियों के ऑडियो-विजुअल रिकॉर्डिंग के अनधिकृत दुरूपयोग , संपादन, प्रसार, अपलोडिंग और मौद्रिकीकरण जैसे गलत मंशा से होने वाले इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी, हालांकि यह स्पष्ट किया था कि प्रामाणिक समाचार रिपोर्टिंग स्वयं प्रतिबंधित नहीं है।

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